डॉ देवेन्द्र नाथ शर्मा
भारत में 50 प्रतिशत से अधिक किशोर रोज चार घंटे से ज्यादा टाइम स्क्रीन पर बिताते हैं, जिससे पढ़ाई, खेल और परिवार से संवाद का समय कम हो जाता है। इससे मोटापा, आलस्य, थकान और कमजोर स्टैमिना की समस्याएं बढ़ रही हैं। 60 प्रतिशत बच्चों में नींद पूरी नहीं होने से उनमे चिड़चिड़ापन और गुस्सा की प्रवृत्ति बढ़ती है तथा अपने भावनात्मक नियंत्रण की क्षमता कमजोर होने लगती है। चार घंटे से अधिक स्क्रीन टाइम वाले 25.9 प्रतिशत बच्चे अवसादग्रस्त पाए गए जबकि इससे कम स्क्रीन टाइम वाले बच्चों में केवल 9.5 प्रतिशत ही अवसाद की समस्या पाई गई।
तकनीक ने मोबाइल के ज़रिए सोशल मीडिया प्लेटफार्म और गेमिंग व ऐसे ही अन्य कई ऐप्स की लत से विश्व भर के बच्चों को एक ख़तरनाक और गंभीर स्थिति में ला दिया है। बच्चों में मानसिक व शारीरिक विकार बढ़ रहे हैं, वे साइबर अपराधों के शिकार हो रहे हैं । मोबाइल के कारण बच्चे आत्महत्या कर लगे हैं। बच्चों के सामाजिक व शैक्षिक जीवन पर इसका बुरा असर हो रहा है ।
140 करोड़ की जनसँख्या के इस देश में दिसंबर 2025 तक 124.42 करोड़ मोबाइल धारक और 1.02 करोड़ से अधिक इंटरनेट ब्रॉडबैंड उपयोगकर्ता हो गए हैं। हर माह प्रति व्यक्ति औसत डाटा की खपत 25 जीबी वाला हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा दूसरा दूरसंचार बाजार है। कोरोना काल में स्कूल बंद होने के कारण ऑनलाइन कक्षाए संचालित कर बच्चों की पढ़ाई करवाने के सरकारी फरमान के बाद स्कूली बच्चों के हाथों में स्मार्टफोन देना पालकों की विवशता हो गई। हालाकि केंद्र के सरकारी और ऊँची फीस वाले निजी स्कूलों में इन ऑनलाइन कक्षाओं का विधार्थियों ने भरपूर लाभ लिया और अपनी सीखना जारी रखा, लेकिन लाखों सरकारी व छोटे गैर-सरकारी स्कूलों में यह मात्र औपचारिकता ही रहा और विधार्थी सीखने में पिछड़ गए। इस समूची कवायद का हश्र यह हुआ कि आदिवासी व ग्रामीण बसाहटों और शहरी झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले गरीब परिवारों के अधिकतर बच्चों को छोड़ कर देश भर के करोड़ो बच्चों के हाथों में यह उपकरण आ गया। सूचना, ज्ञान, संचार, वित्तीय लेनदेन और नियंत्रित मनोरंजन जैसी मूल आवश्यकताओं पीछे छोड़ ज्यादातर बच्चे इस उपकरण का व्हाट्सअप, फेसबुक, इंस्ट्राग्राम, जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स, यू-टयूब व गेमिंग के एप्स, सेल्फी, विडियो व रील बनाने आदि में जरुरत से बेहिसाब ज्यादा इस्तेमाल करने लगे हैं। घंटों स्क्रीन पर अपनी आँखें और ध्यान गड़ाए रख आभासी दुनिया में विचरण करने लगते हैं। यह स्थिति कई चिंताए पैदा करती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन जैसी मानक संस्थाओं के अध्ययनों के अनुसार भारत में 2 साल से कम उम्र के 61 प्रतिशत बच्चे स्क्रीन देखना शुरू कर देते हैं। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि 2 साल तक के बच्चों को स्क्रीन बिल्कुल ही नहीं दिखानी चाहिए। भारत में 50 प्रतिशत से अधिक किशोर रोज चार घंटे से ज्यादा टाइम स्क्रीन पर बिताते हैं, जिससे पढ़ाई, खेल और परिवार से संवाद का समय कम हो जाता है। इससे मोटापा, आलस्य, थकान और कमजोर स्टैमिना की समस्याएं बढ़ रही हैं। 60 प्रतिशत बच्चों में नींद पूरी नहीं होने से उनमे चिड़चिड़ापन और गुस्सा की प्रवृत्ति बढ़ रही है तथा उनमें भावनात्मक नियंत्रण की क्षमता कमजोर होने लगी है। चार घंटे से अधिक स्क्रीन टाइम वाले 25.9 प्रतिशत बच्चे अवसादग्रस्त पाए गए जबकि इससे कम स्क्रीन टाइम वाले बच्चों में केवल 9.5 प्रतिशत ही अवसाद की समस्या पाई गई।
बाज़ार की जरूरतों के मद्देनजऱ, सोशल मीडिया प्लेटफार्म और गेमिंग सहित कई लुभावनी एप्स को जानबूझकर इस तरह डिजाइन किया जाता है कि वह बच्चे लंबे समय तक मोबाइल से बंधे रहें और इसके इस्तेमाल की लत के शिकार हो जावें। लत में पड़ कर वे देर रात तक जाग रहे हैं, नींद पूरी न होने से शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हो रहा है, आत्म विश्वास कम हो रहा है। दूर तक देखने की क्षमता कम होने सहित नेत्र दोषों के शिकार हो रहे बच्चे। स्थिति यह हो जाती है कि वे मोबाइल के उपयोग से अपने आप को रोक ही नहीं पाते हैं। बार-बार व्हाट्सअप, फेसबुक या इंट्राग्राम पर पोस्ट चेक करते हैं। यहाँ तक बाथरूम में भी मोबाइल साथ रहता है। मोबाइल के बिना रहने, नेटवर्क न मिलने या फोन खो जाने का तर्कहीन डर उनमे बना रहता है। पोस्ट पर आने वाली लाइक्स और कंमेंटस उनके इए व्यक्तित्व की स्वीकृति का आधार बन उनकी मानसिक स्थिति को प्रभावित करने लगती हैं। यह स्थिति नोमोफोबिया नामक एक आधुनिक मानसिक विकार है, जो 12 से 23 वर्ष के बच्चों में ज्यादा पाया जाता है। चिड़चिड़ापन, गुस्सा, तनाव, चिंता, घबराहट, कांपना, पसीना आना, अकेलापन, और अवसाद इसके लक्षण हैं। कुछ बच्चों पर मोबाइल इस कदर हावी होता जा रहा है कि वे वर्चुअल दुनिया में खोये से रहते हैं। रोकने-टोकने पर तनावग्रस्त होकर क्रोध में आ जाते हैं, आपा खोकर असामान्य व्यवहार करने लगते हैं। मोबाइल के उपयोग पर सक्ती से मनाही करने या मोबाइल छुड़ा लेने की स्थिति में कई बार बच्चे आत्महत्या तक कर लेते हैं। मोबाइल के कारण बच्चों द्वारा आत्महत्या किए जाने के ख़बरें कहीं न कहीं से रोज सुनने को मिलती हैं ।
फेसबुक व इंस्टाग्राम पर अनियंत्रित आपत्तिजनक, अश्लील, उत्तेजक व बहलाने-फुसलाने वाले कंटेंट, बच्चों को गलत कामों, अपराधों, यौन उत्पीडन, ब्लेकमेलिंग और मानव तस्करी जैसे खतरों में धकेल रहे हैं। संसद में सरकार ने बताया है कि 2001 से 2023 तक दो वर्षों में बच्चों के विरुद्ध साइबर अपराध 38 प्रतिशत बढ़े हैं जबकि कुछ राज्यों जैसे केरल में 172 प्रतिशत, उत्तराखंड में 178 प्रतिशत, कर्नाटक में 121 प्रतिशत व छत्तीसगढ़ में 119 प्रतिशत की चिंताजनक बढौतरी दर्ज की गई है। भारत सरकार ने इस साल के इकोनामिक सर्वे में ‘डिजिटल एडिक्शनÓ को बड़ा स्वास्थ्य के देखभाल का मुद्दा माना है।
हमारे देश में लचर साइबर कानूनों व अप्रभावी नियंत्रण नीतियों के कारण भारत में बच्चे इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के टारगेट पर हैं। पालक, शैक्षणिक व सामाजिक संस्थाए और नागरिक संगठन बच्चों से जुड़े इस बेहद संवेदनशील मुद्ददे पर मुखर नहीं है। अमेरिका की न्यू मैक्सिको में एक कोर्ट ने एक स्कूल द्वारा दायर वाद पर अभी ही दिए एक फैसले में मेटा को बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने में नाकाम रहने का दोषी मान कर मेटा पर 3141 करोड।पए का जुर्माना लगाया है। हालाकि, मेटा ने अपनी पिछली तिमाही में इससे 160 गुना ज्यादा रेवेन्यू कमाया था। भारत में कड़े कानूनों और ऐसी जागरूकता की जरूरत है ताकि इन मुनाफाखोर कंपनियों पर नकेल कसी जा सके।
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