जौनपुर 7 अप्रैल (आरएनएस)। प्राथमिक कृषि ऋण समितियां (बी-पैक्स) गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रही हैं। इन समितियों के कर्मचारियों को पिछले दो साल से वेतन नहीं मिला है, जिससे उनके सामने गहरा आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। समितियों पर गेहूं और धान खरीद के कमीशन तथा पल्लेदारी का कुल 2.12 करोड़ रुपये बकाया है। यह बकाया पिछले साल की गेहूं खरीद और इस साल की धान खरीद से संबंधित है। कर्मचारियों का कहना है कि इस भुगतान के अभाव में उनकी वित्तीय स्थिति बेहद खराब हो गई है, जिससे दैनिक जीवनयापन में कठिनाई आ रही है। किसानों को साहूकारों के शोषण से बचाने और उन्हें कृषि उत्पादों का उचित मूल्य दिलाने के उद्देश्य से सरकार सहकारिता को बढ़ावा देती रही है। इसी क्रम में वर्ष 1965 में सहकारिता समिति नियमावली बनाई गई थी। इसके बाद 1975 में न्याय पंचायत स्तर पर साधन सहकारी समितियों की स्थापना की गई। इन समितियों में गोदामों का निर्माण कर सचिवों, विक्रेताओं और चैकीदारों की नियुक्ति की गई थी। इन समितियों के माध्यम से किसानों को मामूली ब्याज पर खाद-बीज और कृषि कार्य के लिए ऋण उपलब्ध कराया जाता था, जिससे उन्हें काफी लाभ मिला। विभिन्न कर्जमाफी योजनाओं और सरकारी अनदेखी के कारण इन समितियों की वित्तीय स्थिति लगातार बिगड़ती गई। उत्तर प्रदेश सहकारी समिति कर्मचारी संघ के अध्यक्ष वीर बहादुर सिंह ने बताया कि पिछले चार वर्षों से लोडिंग-अनलोडिंग और दो वर्षों से गेहूं-धान क्रय कमीशन आदि का 2 करोड़ 12 लाख रुपये का भुगतान नहीं किया गया है।उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ कर्मियों और अधिकारियों की मिलीभगत से ठेकेदारों को बिना लेबर उपलब्ध कराए ही फर्जी तरीके से भुगतान कर दिया गया। इस संबंध में एआर कोऑपरेटिव बृजेश पाठक ने बताया कि धान-गेहूं खरीद के कमीशन भुगतान के लिए विभाग को पत्र लिखा गया है। कहा कि पीसीए के प्रबंधक ने सूचित किया है कि इस मद का पैसा अभी प्राप्त नहीं हुआ है और राशि आते ही समितियों को भुगतान कर दिया जाएगा। कर्मचारियों ने मांग की है कि एक त्रिस्तरीय कमेटी बनाकर पिछले चार वर्षों के भुगतान की गहन जांच कराई जाए और दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए। कार्यकारी अध्यक्ष ने बताया कि इस समस्या के समाधान के लिए 20 मार्च को विभाग के अधिकारियों को पत्रक देकर अवगत कराया गया था, लेकिन उसका कोई सार्थक नतीजा नहीं निकला है।
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