अजय दीक्षित
23 और 29 अप्रैल को होने वाले पश्चिमी बंगाल विधानसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विशेष महत्व रखते हैं इन चुनावों की उतनी ही अहमियत है जितनी उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की होती है बल्कि उससे इस मायने में अधिक है कि भारतीय जनता पार्टी पश्चिमी बंगाल में अटलविहारी वाजपई के समय से जनाधार जुटाने में लगी है। अटलजी के मंत्री परिषद में तपन सिकदर पहली बार राज्य मंत्री 1999 में बने थे।तब से भारतीय जनता पार्टी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा है।2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 04 सीट मिली थी लेकिन 2016 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को 03 सीट मिली पर वोट शेयर 10 फीसदी था ।तब पश्चिमी बंगाल में सीपीएम, कांग्रेस दूसरे और तीसरे स्थान पर थी । तृणमूल कांग्रेस सत्ता में बैठी और ममता बनर्जी दूसरी बार मुख्यमंत्री बनी। उस के बाद पश्चिमी बंगाल के लोगों ने भारतीय जनता पार्टी को गंभीरता से लिया और 2019 लोकसभा चुनाव में
भाजपा को 39 फीसदी वोट और 42 में से 18 सीट मिली थी सीपीएम,कांग्रेस का एक एक सांसद चुना गया था यही से भारतीय जनता पार्टी की पश्चिमी बंगाल यात्रा शुरू हुई।सीपीएम का वोट शेयर मात्र 8 फीसदी पर आ गया और कांग्रेस का 03 फीसदी।2024 के लोकसभा और 2021 विधानसभा चुनाव में 77 विधायक जीतकर आए।वोट शेयर 39 फीसदी मिला । उल्लेखनीय यह रहा कि नंदीग्राम से भारतीय जनता पार्टी के नेता सुबेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हरा दिया। इन चुनावों में ममता बनर्जी ने बंगाल अस्मिता का मुद्दा उठाया और वह कामयाब रहा था लेकिन इस बार भाजपा ने रणनीत बदलकर ममता बनर्जी की सरकार को केंद्रित किया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विधानसभा चुनाव की अपने हाथ में ली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोलकाता, मुर्शिदाबाद की रैली में राज्य के विकास, महिलाओं की स्थिति, सरकार का भ्रष्टाचार, तृणमूल कांग्रेस की मनमानी,को मुख्य रूप से उठाया है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए पश्चिमी बंगाल विधानसभा चुनाव बहुत मायने रखता है। पश्चिमी बंगाल से 2029 लोकसभा चुनाव का रास्ता निकलेगा। भारतीय जनता पार्टी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ चाहता कि 2029 में भाजपा अकेले दम पर 350 सीट जीते उसके लिए पश्चिमी बंगाल में 42 लोकसभा सीट पर भी उनकी नजर है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय मजदूर संघ, और विद्या भारती,बनवासी कल्याण परिषद,सेवा भारती, संस्कृत भारती,आदि बुनियादी संगठनों का फैलाव भी इस विधानसभा चुनाव से जुड़ा है। पश्चिमी बंगाल में अवैध मुस्लिम, बांग्लादेशी घुसपैठ,सीमांत प्रदेश होने के कारण सामरिक विषय भी मुख्य मुद्दा है। चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि अगर भारतीय जनता पार्टी 43 से 45 तक वोट शेयर करती है तो उसे पूर्ण बहुमत मिल सकता है। भारतीय जनता पार्टी का एक तबका चाहता है कि तुड़मूल के हिंदू समर्थक अगर जरा भी चेते तो बंगाल में सत्ता परिवर्तन करने से कोई रोक नहीं सकता। दूसरी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एस आई आर को मुख्य मुद्दा बनाया है। लेकिन इस मुद्दे हवा निकल रही है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने उनके अनुरोध को स्वीकार न्यायाधीश को काम पर लगाया है।मालदा में कुछ मुस्लिम ने उन पर ही हमला कर दिया है।अबकी बार चुनाव आयोग भी विशेष तैयारी से चुनाव कराने जा रहा है।उसने प्रत्येक मतदान केंद्र पर सीसीटीवी कैमरा लगाया और उसकी देखभाल अनुविभागीय अधिकारी करेगा ।दो चरणों होने वाले चुनाव में बेहिसाब अर्धसैनिक बलों की तैनादगी की गईं है। कोलकाता से प्रकाशित टाइम्स ऑफ इंडिया में
शीतल पाल सिंह कहते हैं कि इस बार के चुनावों में ममता बनर्जी उतनी कॉन्फिडेंट नहीं है।वे कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी बहुमत आई तो राज्य का बुनियादी ढांचे बदलेगा । तपन दास गुप्ता जो बंगाल के प्रमुख प्रकाशित बंगाल टाइम्स में कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी के लिए यह अच्छा है कि सीपीएम, कांग्रेस का कोई विशेष असर नहीं है लेकिन यह भी है कि मुस्लिम मतों का विभाजन नहीं हो रहा है जिससे ममता बनर्जी को लाभ होगा लेकिन इन पार्टियां के हिंदू समर्थक भारतीय जनता पार्टी को वोट देंगे। सुप्रसिद्ध चुनाव विशेषज्ञ यशवंत देशमुख का कहना है ममता बनर्जी की तुड़मूल सरकार से महंगाई, असुरक्षा, महिलाओं के उत्पीडऩ से खुश नहीं है लेकिन ममता बनर्जी अभी भी सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं।असुदुद्दीन ओवेशी की पार्टी भी मुस्लिम वोट लेकर चौंका सकती है।कुछ भी हो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अग्नि परीक्षा है ।
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