नई दिल्ली , 14 अप्रैल (आरएनएस)। भारतीय घरों में घुटनों का दर्द अक्सर उम्र बढऩे का एक सामान्य हिस्सा मान लिया जाता है। इसकी शुरुआत हल्की परेशानी से होती है जैसे सीढिय़ां चढऩे में दिक्कत, बैठने या खड़े होने में दर्द—लेकिन धीरे-धीरे यह चलने-फिरने और रोजमर्रा के कामों को प्रभावित करने लगता है। लंबे समय से इसका इलाज लगभग तय रहा है: जब दवाइयों, फिजियोथेरेपी और इंजेक्शन से राहत नहीं मिलती, तो नी रिप्लेसमेंट को अगला कदम माना जाता है। लेकिन अब यह सोच बदलती हुई नजर या रही है। डॉ. एन. के. अग्रवाल, एक अनुभवी आर्थोपेडिक सर्जन जिनके पास 50 से अधिक वर्षों का अनुभव है और जो भारत में नी रिप्लेसमेंट के शुरुआती विशेषज्ञों में से रहे हैं, पहले इसी समाधान में पूरी तरह विश्वास रखते थे। उन्होंने भारत, यूके, यूरोप और अमेरिका के प्रमुख संस्थानों में प्रशिक्षण और काम किया है, और लुधियाना के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज में आर्थोपेडिक्स विभाग के प्रमुख और प्रोफेसर के रूप में सेवा दी है। अपने करियर में उन्होंने हजारों सर्जरी की हैं और कई मरीजों को चलने-फिरने की क्षमता वापस दिलाई है। लेकिन समय के साथ उन्हे एक बात खटकने लगी, जो थी ऑपरेशन के बाद मरीजों में संतुष्टि। करीब 15–20 वर्षों तक लगातार नी रिप्लेसमेंट करने के बाद उन्होंने पाया कि सर्जरी सफल होने के बावजूद, लगभग 20–25 प्रतिशत मरीज पूरी तरह संतुष्ट नहीं होते। कई मामलों में दर्द या जकडऩ बनी रहती है और चलने-फिरने की क्षमता पहले जैसी नहीं हो पाती। तकनीक में सुधार, रोबोटिक्स और नई विधियों ने सर्जरी को अधिक सटीक तो बनाय, लेकिन मरीजों की संतुष्टि में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। यहीं से यह सवाल उठा कि क्या इलाज समस्या की जड़ तक पहुंच भी रहा है या नहीं।
वे आज भी जरूरत पडऩे पर नी रिप्लेसमेंट करते हैं, लेकिन इसे पहला नहीं बल्कि आखिरी विकल्प मानते हैं। मरीजों के लिए संदेश साफ है—घुटनों के दर्द को नजरअंदाज न करें और इलाज के लिए केवल सर्जरी पर निर्भर न रहें। अब रीजेनरेशन आधारित इलाज एक मजबूत और उभरता हुआ विकल्प बनकर सामने आ रहा है।
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