अबू धाबी, 20 अपै्रल। ईरानी हमलों के बाद संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में बहस छिड़ गई है कि क्या अमेरिकी सैन्य अड्डे खाड़ी देशों के लिए जरूरी हैं। दरअसल, खाड़ी देशों के नीति विशेषज्ञ और विश्लेषक इस मुद्दे पर चर्चा रहे हैं। इसमें सवाल उठाया जा रहा है कि क्या विदेशी सैन्य अड्डों की मेजबानी से देश के दीर्घकालिक हित पूरे हो रहे हैं? यह चिंता तब और बढ़ गई, जब अमेरिकी-इजरायली हमलों की खीज ईरान लगातार खाड़ी देशों पर उतार रहा था।
यूएई के प्रख्यात टिप्पणीकार और राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर अब्दुलखलेक अब्दुल्ला ने दृढ़तापूर्वक तर्क दिया है कि यूएई में अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठान अब लाभकारी नहीं रह गए हैं, नीति पर पुनर्विचार का समय आ गया है। उन्होंने एक्स पर कहा, ये ठिकाने अब रणनीतिक संपत्ति नहीं रह गए हैं, बल्कि बोझ बन गए हैं। उन्होंने लिखा कि अब देश को सुरक्षा के लिए उस तरह से अमेरिका की आवश्यकता नहीं है जैसी पहले हुआ करती थी।
अब्दुल्ला ने एक्स पर बताया कि खाड़ी देशों पर हुए ईरानी हमले के समय यूएई ने यह साबित कर दिया कि वह अपनी रक्षा खुद और वह भी बहुत ही शानदार तरीके से करने में सक्षम है। उन्होंने लिखा कि यूएई को अगर किसी चीज की जरूरत है, तो वह है अमेरिका के पास मौजूद सबसे बेहतरीन और आधुनिक हथियार, उनको अब यूएई को हासिल करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सैन्य अड्डे अब एक बोझ बन गए हैं।
यूएई समेत खाड़ी देशों में यह बहस तब शुरू हुई, जब अमेरिका-इजरायल ईरान पर गोले बरसा रहे थे और ईरान उनका जवाब यूएई, बहरीन, इराक और कुवैत सहित कई खाड़ी देशों में हमला करके दे रहा था। ईरान ने तब कहा था कि वह खाड़ी देशों के बुनियादी ढांचों पर नहीं बल्कि अमेरिकी सैन्य संपत्तियों को निशाना बना रहा है। हालांकि, ईरान ने ऊर्जा संसाधनों पर भी हमला किया था। खाड़ी देशों ने कई ईरानी मिसाइलें-ड्रोन सफलतापूर्वक रोके थे।
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