-सीता प्राकट्योत्सव पर कुटुंब प्रबोधन
अयोध्या ,25 अपै्रल (आरएनएस)। परशुराम शाखा अंतर्गत कुटुंब गतिविधि में ट्रांसपोर्टनगर में बैसाख शुक्ल नवमी पर माता सीता के प्राकट्योत्सव मनाया गया। प्रबोधन में महानगर सह सेवा प्रमुख डॉ उपेन्द्र मणि त्रिपाठी ने कहा माता सीता का जीवन चरित वर्तमान पीढ़ी की बालिकाओं, किशोरियों के लिए श्रेष्ठतम आदर्श है। अयोध्यावासी होने के नाते भी हमारे परिवारों में इस विषय पर चिंतन अवश्य होना चाहिए। निसंतान दंपत्ति मिथिला के राजा जनक को पृथ्वी से पुत्री की प्राप्ति की कथा वर्तमान वैज्ञानिक दृष्टि से स्वयं में गूढ़ है। किंतु कुशल माता पिता से प्राप्त पोषित संस्कारी राज पुत्री जब अयोध्या की बहू बन कर आती है तो दास दासियों के होते हुए भी रसोई स्वयं बनाती है,पति के राजा बनने से पूर्व ही वनवासी होने के निर्णय पर सास के कहने पर भी अपने तर्कों से पति के निर्णय पर प्रश्न नहीं उठाती, न ससुराल पक्ष को आरोपित करती हैं और न इसकी सूचना मायके को देती है अपितु पति का प्रत्येक परिस्थिति में साथ देने को प्रस्तुत हो जाती हैं। महलों में पली बढ़ी किंतु वर्षों वन के अभाव में कभी शिकायत नहीं करती प्रसन्न रहती हैं , रावण द्वारा हरण कर लिए जाने पर भी संयम धैर्य और विश्वास नहीं खोती, आशावान रहती हैं। अयोध्या वापस आकर महारानी सीता के रूप में गर्भावस्था में भी राजनैतिक परिस्थितियों में एक बार पुन: गृह त्याग करने के निर्णय में राजा श्रीराम के राजधर्म पालन का संशय मिटाती हैं। महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में पति परिवार से दूर वन में पुत्रों को जन्म देकर गुरुकुल में उनकी शिक्षा दीक्षा कराती हैं। और यह माता सीता के जीवन का सबसे प्रभावी और अनुकरणीय पक्ष कहा जा सकता है जब उन्होंने अपनी संतानों को परिवार और कुल की प्रतिष्ठा के अनुरूप शिक्षा और संस्कारों से पोषित किया, उन्हें पिता और परिवार का विद्रोही नहीं बनाया, अर्थात माता सीता के जीवन में सताया गया मन नहीं था, मर्यादा और धर्म पालन में अपनाया गया जीवन संघर्ष था। यह प्रसंग स्वयं इस बात के प्रमाण है कि पुत्री के रूप में राजा जनक पंचवटी में मिलकर वनवासी पतिव्रता सीता के पिता होने पर गर्व करते हैं, राजधर्म निभाने पर राजा राम पत्नी सीता के वियोग में राज वैभव त्याग कर पति होने पर गर्व करते हैं, तो लव कुश जब पिता को पहचानते हैं तो पुत्र होने पर गर्व करते हैं। पिता ,माता, परिवार ,राज्य के लिए सम्मान भाव ही रहता है। जबकि आज कल परिवारों में रिश्तों में अहम व अधिकारों संघर्ष है वहीं माता सीता का जीवन चरित बताता है कि कर्तव्यपालन अधिकार की चेष्टा से अधिक श्रेष्ठ है जो व्यक्तित्व को पूज्य बना देता है।
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