नई दिल्ली,27 अपै्रल (आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि शादी के झूठे वादे के आधार पर यौन शोषण का आरोप उस रिश्ते में कैसे लगाया जा सकता है, जो एक लंबा लिव-इन रिलेशनशिप रहा हो और उनका एक बच्चा भी है. यह मामला जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की बेंच के सामने आया.
बेंच एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी जिसमें शादी का झांसा देकर बलात्कार का आरोप लगाया गया था. इस मामले में, दोनों पक्ष करीब 15 साल तक साथ रहे थे और उनका एक बच्चा भी था. सुनवाई के दौरान, बेंच ने याचिकाकर्ता के वकील से अपराध के जरूरी तत्वों की मौजूदगी के बारे में पूछा और रिश्ता टूटने के कानूनी नतीजों पर सवाल किए.
बेंच ने मौखिक रूप से पूछा, वह शादी से पहले उसके साथ रहने क्यों गई? देखिए, अब अगर हम ये सवाल पूछते हैं, तो कहा जाता है कि हम पीडि़ता को शर्मिंदा कर रहे हैं. यह सब क्या है…? बेंच ने आगे सवाल किया, एक बार जब वह (आरोपी) रिश्ते से बाहर निकल जाता है, तो क्या यह एक आपराधिक अपराध बन जाता है?
महिला ने दावा किया कि उस व्यक्ति ने कम उम्र में ही उसे अपने जाल में फंसा लिया था और यह बात छिपाई थी कि वह पहले से शादीशुदा है. आरोप है कि उस व्यक्ति ने उससे शादी करने का वादा किया और उसके साथ संबंध बनाए.
बेंच ने आगे पूछा, वह उसके साथ रहने क्यों गई और उसने बच्चे को जन्म क्यों दिया? अब वह यौन उत्पीडऩ की बात कह रही है. दावा किया गया है कि याचिकाकर्ता (महिला) को इस बात की जानकारी नहीं थी कि आरोपी पहले से शादीशुदा है और बाद में उसे पता चला कि उसके अन्य महिलाओं के साथ भी संबंध थे.
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि आरोप यह है कि उसने महिला का यौन उत्पीडऩ किया और शादी का झूठा वादा किया. वकील ने दलील दी कि जब आरोपी उससे मिला था, तब उसकी उम्र महज 18 साल थी. बेंच ने उनके दशक भर पुराने रिश्ते की ओर इशारा किया और इस मामले में आपराधिक आरोप लगाए जाने की योग्यता पर सवाल उठाया.
बेंच ने टिप्पणी की, तो, यह एक आपसी सहमति से बना रिश्ता था. वे साथ रह रहे थे. बेंच ने आगे पूछा, उसका एक बच्चा हुआ और फिर वह यौन उत्पीडऩ और इन सब की शिकायत दर्ज कराती है… इसमें अपराध कहां है?
याचिकाकर्ता के वकील ने दावा किया कि आरोपी ने इसी तरह अन्य महिलाओं का भी शोषण किया है. इस पर बेंच ने कहा, हमें इससे कोई सरोकार नहीं है कि वह अन्य महिलाओं के साथ क्या कर रहा है. हमारा सरोकार इस याचिकाकर्ता से है. बेंच ने सवाल किया- 15 साल? इस मोड़ पर आकर उन्होंने शिकायत दर्ज कराई है….
बेंच ने मौखिक रूप से वकील से कहा, हम आपकी क्लाइंट के साथ केवल सहानुभूति रख सकते हैं… वह उनके साथ गईं, एक बच्चा हुआ और 15 साल तक उनके साथ रहीं. बेंच ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता अन्य कानूनी रास्तों को अपना सकती है, जिसमें बच्चे के भरण-पोषण की मांग शामिल है. बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि आपराधिक कानून का सहारा लेने के लिए अपराध का स्पष्ट रूप से साबित होना जरूरी है.
दलीलें सुनने के बाद, अदालत ने इस विवाद को मध्यस्थता के लिए भेज दिया. गौरतलब है कि याचिकाकर्ता ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें उसके पूर्व लिव-इन पार्टनर के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया गया था.
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