# घुटनों को सुरक्षित रखने के लिए साक्ष्य-आधारित और कम हस्तक्षेप वाले इलाज पर विशेषज्ञों का बढ़ता जोर
नई दिल्ली, 03 मई (आरएनएस)। ऑर्थोपेडिक इलाज में रिप्लेसमेंट से रीजेनरेशन की ओर बढ़ते रुझान को मजबूती देते हुए, वरिष्ठ आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. नरेश के. अग्रवाल ने नई दिल्ली के होटल नोवोटेल सिटी सेंटर में आयोजित तीसरे दिल्ली ऑर्थोबायोलॉजिक्स कोर्स 2026 में अपना चर्चित ‘लुधियाना प्रोटोकॉल’ प्रस्तुत किया। यह सम्मेलन दिल्ली ऑर्थोपेडिक एसोसिएशन के तत्वावधान में, इंडियन ऑर्थोपेडिक एसोसिएशन के सहयोग से आयोजित हुआ, जिसमें देशभर के विशेषज्ञों ने ऑर्थोबायोलॉजिक्स के क्षेत्र में व्यावहारिक और साक्ष्य-आधारित इलाज तरीकों पर चर्चा की। कोर्स के दूसरे दिन घुटनों पर केंद्रित वैज्ञानिक सत्र में डॉ. अग्रवाल ने घुटने के ऑस्टियोआर्थराइटिस के प्रबंधन के लिए एक समेकित और कम हस्तक्षेप वाला दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। यह तरीका पारंपरिक जॉइंट रिप्लेसमेंट पर निर्भरता से आगे बढ़ते हुए, बीमारी के मूल कारण को समझने पर आधारित है। उनकी प्रस्तुति ने इस बात पर जोर दिया कि ऑस्टियोआर्थराइटिस केवल घिसाव नहीं, बल्कि शरीर में होने वाली लंबे समय की सूजन से जुड़ी स्थिति है। भारत में घुटनों के ऑस्टियोआर्थराइटिस के बढ़ते मामलों के बीच, लुधियाना प्रोटोकॉल जैसे तरीके शुरुआती हस्तक्षेप के लिए एक साक्ष्य-आधारित विकल्प के रूप में उभर रहे हैं, जो मरीजों की जीवन गुणवत्ता सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
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