सीतापुर 5 मई (आरएनएस)। ज्येष्ठ माह के पहले बड़े मंगल पर सीतापुर जनपद पूरी तरह भक्तिमय रंग में डूब गया। नैमिषारण्य धाम से लेकर जिला मुख्यालय और दूर-दराज के गांवों तक आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ा कि हर ओर जय बजरंगबली के जयकारे गूंजते रहे। तड़के भोर से ही मंदिरों के बाहर श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग गईं, जो देर रात तक थमने का नाम नहीं ले रहीं थीं। नैमिष में श्रद्धालुओं ने आस्था की डुबकी लगाकर हनुमान जी के दरबार में माथा टेका, तो शहर के प्रमुख मंदिरों में भजन-कीर्तन, सुंदरकांड और हनुमान चालीसा के पाठ से माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो उठा। महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों ने बढ़-चढ़कर पूजा-अर्चना की और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। सिर्फ मंदिर ही नहीं, बल्कि सड़क से लेकर मोहल्लों और गांवों तक सेवा और श्रद्धा का अनूठा संगम देखने को मिला। हरगांव, लहरपुर मार्ग, दतेली और आसपास के ग्रामीण इलाकों में जगह-जगह भव्य भंडारे सजाए गए। पूड़ी-सब्जी, कढ़ी-चावल, हलवा और ठंडे शरबत का प्रसाद देर रात तक बांटा जाता रहा। तेज धूप के बीच श्रद्धालुओं की सेवा में जुटे युवाओं का उत्साह भी देखने लायक था। कई स्थानों पर सामाजिक संगठनों ने छाया, पानी और प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था भी की। प्रशासन ने भीड़ को देखते हुए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए, जिससे पूरा आयोजन शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हुआ। कुल मिलाकर पहला बड़ा मंगल सीतापुर में आस्था, सेवा और सामाजिक एकजुटता का जीवंत उदाहरण बन गया।
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भंडारे में ‘आस्थाÓ भारी, लेकिन गैस संकट ने खोली सिस्टम की पोल
पहले बड़े मंगल पर जहां एक ओर श्रद्धा का समंदर उमड़ा, वहीं दूसरी ओर गैस सिलेंडर की किल्लत ने पूरे सिस्टम की हकीकत उजागर कर दी। जिन भंडारों में हजारों लोगों को प्रसाद वितरित होना था, वहां आयोजकों को गैस के लिए जूझना पड़ा। कई जगहों पर हालात ऐसे रहे कि तैयारियां अधूरी रह गईं और आयोजकों को आखिरी समय पर लकड़ी और जुगाड़ के सहारे खाना बनाना पड़ा। सवाल यह है कि हर साल होने वाले इस बड़े धार्मिक आयोजन के बावजूद गैस आपूर्ति की कोई ठोस योजना क्यों नहीं बनाई गई? आयोजकों का कहना है कि मांग बढ़ी जरूर थी, लेकिन आपूर्ति व्यवस्था पूरी तरह फेल रही। जिम्मेदार विभाग या तो अनजान बने रहे या फिर उन्होंने समय रहते कोई कदम उठाना जरूरी नहीं समझा। यह लापरवाही सिर्फ व्यवस्थाओं की कमी नहीं, बल्कि आस्था से जुड़े आयोजन की अनदेखी भी है। अगर हालात ऐसे ही रहे तो भविष्य में बड़े आयोजनों में अव्यवस्था और बढ़ सकती है। अब वक्त है कि जिम्मेदारों से जवाबदेही तय हो, वरना हर बार आस्था के नाम पर सिस्टम की नाकामी यूं ही उजागर होती रहेगी।
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