० पूर्व संभागायुक्त डॉ. संजय अलंग द्वारा मिली ऐतिहासिक महत्व की दुर्लभ पांडुलिपियां
रायपुर, 05 मई (आरएनएस)। कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह के निर्देशानुसार जिले में ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण हेतु ज्ञानभारतम् मिशन के अंतर्गत हस्तलिखित पांडुलिपियों का सर्वेक्षण सफलतापूर्वक किया जा रहा है। इसी क्रम आज पूर्व संभागायुक्त एवं सेवानिवृत्त आईएएस डॉ. संजय अलंग द्वारा कई दुर्लभ एवं महत्वपूर्ण पांडुलिपियाँ प्राप्त हुईं, जिनमें कोरिया रियासत की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े दस्तावेज, छत्तीसगढ़ के नामकरण का ऐतिहासिक आधार तथा विभिन्न कालखंडों की सामाजिक एवं सांस्कृतिक झलक देखने को मिली।
डॉ. अलंग द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, कोशल नाम की उत्पत्ति उस समय मानी जाती है जब जबलपुर मार्ग से होकर शासक चिल्पी घाटी पार करते थे, जिसके एक ओर क्षेत्र को महाकौशल और दूसरी ओर को कोसल कहा गया। वहीं छत्तीसगढ़ नाम का उद्भव क्षेत्र में स्थित 36 प्राचीन गढ़ों (किलों) के कारण हुआ। उस कालखंड में यह क्षेत्र जमींदारी व्यवस्था पर आधारित था, जहाँ अनेक छोटी-छोटी जमींदारियाँ विद्यमान थीं, जो कलचुरी एवं गोंड शासकों की अधिसत्ता को स्वीकार करते हुए आवश्यकतानुसार सैन्य एवं आर्थिक सहयोग प्रदान करती थीं। साथ ही गौटिया पद्धति से संबंधित अभिलेख भी प्राप्त हुए।
इसके अतिरिक्त 18वीं शताब्दी में मराठा शासन के विस्तार तथा भोंसले शासकों द्वारा नागपुर से छत्तीसगढ़ पर स्थापित शासन व्यवस्था से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी भी सामने आई। डॉ. संजय अलंग ने ऐतिहासिक तथ्यों के साथ उस समय के सामाजिक, पारिवारिक एवं जनजीवन के विभिन्न पहलुओं पर भी प्रकाश डाला।
पांडुलिपियों के संग्रहण एवं डिजिटलीकरण के संबंध में जानकारी देते हुए बताया गया कि छत्तीसगढ़ के नामकरण से जुड़ी सामग्री को संरक्षित किया जा रहा है। साथ ही कोरिया रियासत से संबंधित इलेक्ट्रीसीटी एक्ट 1941 की पांडुलिपि का सफलतापूर्वक स्कैन कर डिजिटल संरक्षण किया गया है।
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