नई दिल्ली,07 मई (आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को केरल के सबरीमला मंदिर, दाऊदी बोहरा समेत कई धर्मों द्वारा अपनाई जाने वाली धार्मिक आजादी से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई हुई.
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि भारतीय समाज में एक हमेशा रहने वाली चीज हर इंसान मर्द, औरत या बच्चे का धर्म के साथ गहरा रिश्ता है. उन्होंने जोर देकर कहा कि यह रिश्ता जिंदगी के ताने-बाने में गहराई से जुड़ा हुआ है, जिससे आस्था के मामले सामाजिक पहचान से अलग नहीं हो सकते.
उन्होंने आगे कहा कि कोर्ट को जो बात परेशान करती है, वह यह मुश्किल सवाल है कि धार्मिक रीति-रिवाजों को कैसे चुनौती दी जाती है. क्या सुधार पंथों के अंदर होना चाहिए, राज्य के दखल से, या अदालती फैसले से.
9 जजों की संविधान बेंच केरल के सबरीमला मंदिर समेत धार्मिक जगहों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और दाऊदी बोहरा समेत कई धर्मों द्वारा अपनाई जाने वाली धार्मिक आजादी के दायरे से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है.
बेंच में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस बी वी नागरत्ना, एम एम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वारले, आर महादेवन और जॉयमाल्या बागची शामिल हैं.
दाऊदी बोहरा समुदाय के केंद्रीय बोर्ड ने 1986 में एक जनहित याचिका फाइल की थी जिसमें 1962 के एक फैसले को रद्द करने की मांग की गई थी, जिसने बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ एक्सकम्युनिकेशन एक्ट, 1949 (बॉम्बे बहिष्कार निवारण अधिनियम 1949) को रद्द कर दिया था. यह कानून किसी भी समुदाय के सदस्य को धर्म से बहिष्कृत करने (एक्सकम्युनिकेशन) को गैर-कानूनी बनाता था. सीनियर एडवोकेट राजू रामचंद्रन ने सुधारवादी दाऊदी बोहराओं के एक समूह का प्रतिनिधित्व किया.
सुनवाई के दौरान, रामचंद्रन ने कहा कि किसी व्यक्ति के धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक कामों के जवाब में किया गया कोई भी काम संविधान के आर्टिकल 25 के तहत संवैधानिक सुरक्षा का विषय नहीं हो सकता है और इसलिए संविधान के आर्टिकल 26 के तहत धर्म का मामला नहीं हो सकता है.
वरिष्ठ वकील ने कहा कि कोई भी अभ्यास जिसका धार्मिक पहलू हो सकता है, लेकिन जो मौलिक अधिकार पर भी काफी और बुरा असर डालती है, वह संविधान के आर्टिकल 25 या आर्टिकल 26 के तहत रोक से बचा नहीं है.
बेंच ने कहा कि अगर हर कोई संवैधानिक कोर्ट के सामने कुछ खास धार्मिक अभ्यास या धर्म के मामलों पर सवाल उठाने लगे, तो इस सभ्यता का क्या होगा, जहां धर्म भारतीय समाज से इतनी गहराई से जुड़ा हुआ है. बेंच ने कहा कि इस अधिकार, मंदिर के खुलने और बंद होने पर सवाल उठाने वाली सैकड़ों याचिकाएं होंगी. जस्टिस सुंदरेश ने कहा कि हर धर्म टूट जाएगा और हर संवैधानिक कोर्ट को बंद करना होगा.
बेंच ने कहा कि अगर दो एंटिटी के बीच विवाद को रहने दिया गया तो हर कोई हर चीज पर सवाल उठाएगा. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि किसी भी दूसरे इलाके के मुकाबले भारत की खास बात यह है कि इतनी सारी अलग-अलग चीजें और अलग-अलग तरह के होने के बावजूद हम एक सभ्यता हैं और अलग-अलग तरह के लोग ही हमारी ताकत हैं.
जस्टिस नागरत्ना ने कहा,हम अभी भी एक सभ्यता हैं, भले ही वे इसे एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य (सॉवरेन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक) कहते हों… हम चलते रहते हैं. हमारे भारतीय समाज में एक स्थिर चीज है इंसानों का,चाहे पुरुष हो, महिला हो, या बच्चा धर्म के साथ रिश्ता, यह हर किसी के लिए बहुत करीबी है.
उन्होंने आगे कहा कि अब, किसी धार्मिक प्रथा या धर्म के मामले पर सवाल कैसे उठाया जाता है. जस्टिस नागरत्ना ने कहा, इस पर सवाल कहां उठाया जाता है, इस पर सवाल क्यों उठाया जाता है, क्या इस पर सवाल उठाया जा सकता है, क्या सुधार के लिए इस पर संप्रदाय के अंदर सवाल उठाया जाना चाहिए, या क्या राज्य को यह करना होगा. या, आप चाहते हैं कि कोर्ट इन सभी पहलुओं पर फैसला करे… यह हमें परेशान कर रहा है.
जस्टिस नागरत्ना ने कहा, हम 9 जजों की बेंच जो तय करती है, वह एक सभ्यता के लिए है.. वह भारत है. भारत को अपने सभी विकास, अर्थव्यवस्था, हर चीज के बावजूद तरक्की करनी चाहिए, हमारे अंदर एक स्थिरता है. हम उस स्थिरता को नहीं तोड़ सकते. यही बात हमें परेशान कर रही है. रामचंद्रन ने जवाब दिया कि भारत संविधान के तहत एक सभ्यता है और इसलिए एक सभ्य समाज में संविधान के खिलाफ कुछ भी जारी नहीं रखा जा सकता है. मामले की सुनवाई जारी है.
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