-कृष्णावतारम भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृति का अनूठा पाठ
अयोध्या 15 मई (आरएनएस)। डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. बिजेंद्र सिंह के नेतृत्व में विश्वविद्यालय परिवार के लिए एक विशेष सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया। स्थानीय अवध मॉल के सिनेमा हॉल में विश्वविद्यालय के अधिकारियों, शिक्षकों और कर्मचारियों ने सामूहिक रूप से पौराणिक एवं सांस्कृतिक फिल्म कृष्णावतारम भाग 1रू हृदयम देखी। भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित इस फिल्म का उद्देश्य शैक्षणिक समुदाय को अपनी जड़ों और समृद्ध इतिहास से जोडऩा रहा। कुलपति ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व सार्वभौमिक है। कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् – श्रीकृष्ण केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि स्वयं जगद्गुरु हैं, जिनका जीवन दर्शन कूटनीति, न्याय, प्रेम और धर्म की स्थापना की जीवंत मार्गदर्शिका है। कुलपति ने बताया कि श्री कृष्ण ने धर्मयुद्ध के माध्यम से न्यायपूर्ण शासन का जो संदेश दिया, वह युगों-युगों तक मानवता का मार्ग प्रशस्त करता रहेगा। कृष्णावतारम जैसी फिल्में हमें जीवन के दर्शन और नैतिकता के गौरवशाली इतिहास से जीवंत रूप में जोड़ती हैं। कुलसचिव विनय कुमार सिंह ने भारतीय दर्शन के मूल वाक्य यतो धर्मस्ततो जय: पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब भी सामाजिक व्यवस्था में असंतुलन पैदा होता है, तब ज्ञान और शक्ति का समन्वय उसे पुन: स्थापित करता है। यह फिल्म श्रीमद्भगवद्गीता के सिद्धांत परित्राणाय साधूनां विनाशाय दुष्कृताम् को चरितार्थ करती है। प्राचीन विज्ञान और वास्तुकला का संगम फिल्म के तकनीकी और ऐतिहासिक पहलुओं पर चर्चा करते हुए प्रो. हिमांशु शेखर सिंह ने बताया कि द्वारिका का इतिहास सिद्ध करता है कि प्राचीन भारत की स्थापत्य कला समुद्री चुनौतियों और शहरी नियोजन के गहरे ज्ञान पर आधारित थी। द्वारिका की वास्तुकला पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश (पंचभूतों) के अद्भुत संतुलन का प्रतीक है।
अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. नीलम पाठक ने फिल्म के सामाजिक पक्ष को रेखांकित करते हुए कहा कि यह फिल्म आने वाली पीढ़ी को भारतीय संस्कृति में श्स्त्री सम्मानश् के उच्च आदर्शों और द्वारिकापुरी के वैभव से परिचित कराएगी। यह महत्वपूर्ण तथ्य भी उभरा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में श्दशावतारश् की अवधारणा आधुनिक श्थ्योरी ऑफ इवोल्यूशनश् विकासवाद का सिद्धांत से भी प्राचीन और व्यापक है, जो जल से लेकर चेतन जीव तक की विकास यात्रा को खूबसूरती से दर्शाती है। प्रो. अनूप कुमार ने कहा कि लेखक-निर्देशक हार्दिक गज्जर की यह फिल्म राम मोरी की पुस्तक श्सत्यभामाश् पर आधारित है। यह फिल्म पारंपरिक कथाओं से हटकर भगवान कृष्ण की लीलाओं को सत्यभामा के दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर नयापन लाती है। फिल्म राधा के साथ-साथ रुक्मिणी, सत्यभामा और जामवंती के प्रसंगों के माध्यम से कृष्ण के श्हृदयश् और उनकी प्रेम लीलाओं को गहराई से दिखाती है। विश्वविद्यालय की यह सामूहिक पहल न केवल मनोरंजन का माध्यम बनी, बल्कि इसने अकादमिक जगत को भारतीय जीवन दर्शन और प्राचीन गौरव के प्रति और अधिक जागरूक किया। इस अवसर पर वित्त अधिकारी पूर्णेन्दु शुक्ल, प्रो. एस एस मिश्र, प्रो. आशुतोष सिन्हा, प्रो. सी के मिश्र, प्रो. फर्रुख जमाल, उपकुलसचिव डॉ. ए के गौतम, डॉ. रीमा श्रीवास्तव के साथ डॉ. पी के द्विवेदी, प्रो. सुरेन्द्र मिश्र, डॉ गीतिका श्रीवास्तव, डॉ. राजेश कुमार सिंह, गिरीश पंत, आशीष मिश्रा सहित बड़ी संख्या में शिक्षक कर्मचारी उपस्थित रहे।
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