नई दिल्ली, 18 मई (आरएनएस)। भारत पिछले कुछ वर्षों से चुपचाप अपनी डिजिटल करेंसी की दिशा तैयार कर रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक ने 2022 में डिजिटल रुपया पायलट शुरू किया था और तब से इस प्रयोग का दायरा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। RBI अब कई केंद्रीय बैंकों के साथ CBDC के जरिए सीमा-पार भुगतान को सक्षम बनाने पर सक्रिय चर्चा कर रहा है। फरवरी 2026 में भारत ने गुजरात में CBDC आधारित सार्वजनिक वितरण प्रणाली की शुरुआत की, जहां प्रोग्रामेबल डिजिटल टोकन के माध्यम से सब्सिडी वाला अनाज सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाया गया और बिचौलियों की पारंपरिक श्रृंखला को पीछे छोड़ दिया गया। अब तस्वीर पहले से कहीं अधिक स्पष्ट है। भारत अपनी डिजिटल करेंसी को केवल भुगतान का माध्यम नहीं, बल्कि कल्याणकारी योजनाओं की डिलीवरी और रेमिटेंस से जुड़ी पुरानी समस्याओं के समाधान के तौर पर देख रहा है। लेकिन इस महत्वाकांक्षा की बारीकी से जाँच जरूरी है और इन सवालों को समझने के लिए हांगकांग का अनुभव एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आता है। दो वर्षों के दौरान हांगकांग मॉनेटरी अथॉरिटी ने दुनिया के सबसे व्यापक रिटेल CBDC प्रयोगों में से एक को अंजाम दिया। ब्लैकरॉक, HSBC, Mastercard और DBS समेत प्रमुख वित्तीय संस्थानों के 11 समूहों ने सेटलमेंट, प्रोग्रामेबल पेमेंट्स और ऑफलाइन ट्रांजैक्शन में CBDC के इस्तेमाल का परीक्षण किया। 2025 के आखिर में सामने आए निष्कर्ष कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण थे।
इसके साथ एक और कठिन सवाल जुड़ा है, जिसका भारत ने अभी तक खुलकर सामना नहीं किया है। प्रोग्रामेबिलिटी अपने स्वभाव में ही यह तय करती है कि धन का उपयोग कैसे और कहां किया जा सकता है। यदि कोई टोकन केवल अधिकृत दुकान से अनाज खरीदने के लिए इस्तेमाल हो सकता है, तो आपात स्थिति में उसी पैसे से दवा नहीं खरीदी जा सकेगी। जो व्यवस्था राशन डीलर को अनाज की हेराफेरी से रोकती है, वही लाभार्थी की स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता को भी सीमित कर सकती है। इसलिए भारत को यह तय करना होगा कि वह आखिर किस तरह की कल्याणकारी व्यवस्था बनाना चाहता है। यदि ट्रांसफर केवल कुछ निश्चित शर्तों के तहत इस्तेमाल किए जा सकें, जैसे केवल अनाज खरीदने वाले वाउचर, तो ऐसी प्रणाली स्वाभाविक रूप से अधिक नियंत्रण और ट्रैसेबिलिटी लेकर आएगी। उस स्थिति में निजता का क्षरण किसी दुर्घटना का परिणाम नहीं, बल्कि व्यवस्था का एक सोचा-समझा हिस्सा बन सकता है।
हांगकांग ने निष्कर्ष निकाला कि उसकी डिजिटल करेंसी रिटेल भुगतान की तुलना में होलसेल बाजारों में अधिक उपयोगी दिखाई देती है। जैसे-जैसे डिजिटल रुपया बड़े स्तर पर आगे बढ़ेगा, भारत के नीति-निर्माताओं को भी इन सवालों का गंभीरता से सामना करना होगा। महत्वाकांक्षी लक्ष्य अपने आप में गलत नहीं हैं, लेकिन उनके साथ ऐसा मॉडल जो व्यावहारिक रूप से टिकाऊ हो, मजबूत निजता सुरक्षा और और इस बात का ईमानदार आकलन आवश्यक है कि सीबीडीसी विशिष्ट रूप से क्या प्रदान करता है और क्या नहीं।
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