लखनऊ, 19 मई 2026। उत्तर प्रदेश के पूर्वी अंचल को सशक्त सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से प्रारंभ की गई सरयू नहर राष्ट्रीय परियोजना आज देश की प्रमुख सिंचाई योजनाओं में शामिल हो चुकी है। दशकों तक लंबित रहने के बाद पूर्ण हुई इस परियोजना ने पूर्वांचल के करोड़ों किसानों के जीवन में व्यापक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया है। यह केवल जल प्रबंधन योजना नहीं, बल्कि कृषि उत्पादन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसान कल्याण को नई दिशा देने वाली विकास गाथा के रूप में उभरी है।पूर्वी उत्तर प्रदेश में घाघरा, सरयू, राप्ती, बाणगंगा और रोहिन नदियों के जल का समुचित उपयोग कर सिंचाई सुविधाओं का विस्तार इस परियोजना का प्रमुख उद्देश्य है। इसके माध्यम से बहराइच, श्रावस्ती, गोंडा, बलरामपुर, बस्ती, संतकबीरनगर, सिद्धार्थनगर, महाराजगंज और गोरखपुर सहित नौ जनपदों को प्रत्यक्ष लाभ मिल रहा है। वर्षों तक वर्षा आधारित खेती पर निर्भर रहे इन क्षेत्रों में अब कृषि अधिक सुरक्षित, व्यवस्थित और लाभकारी बनी है।वर्ष 1978 में प्रारंभ हुई इस परियोजना का प्रस्तावित कल्टिवेबल कमांड एरिया (सीसीए) 11.29 लाख हेक्टेयर निर्धारित किया गया था, जबकि वर्तमान में इसकी सिंचाई क्षमता लगभग 14.04 लाख हेक्टेयर तक पहुंच चुकी है। इतनी विशाल क्षमता वाली इस परियोजना ने पूर्वांचल की कृषि अर्थव्यवस्था को नई गति दी है। परियोजना के अंतर्गत सरयू बैराज और राप्ती बैराज का निर्माण किया गया है। साथ ही अयोध्या, गोला, उतरौला और डुमरियागंज पंप नहर प्रणालियों ने दूरस्थ क्षेत्रों तक जल पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।परियोजना के तहत लगभग 6362 किलोमीटर लंबी नहरों तथा 3817 किलोमीटर लंबी ड्रेनों का निर्माण किया गया, जिससे सिंचाई के साथ जल निकासी की व्यवस्था भी मजबूत हुई है। इससे जलभराव और बाढ़ जैसी समस्याओं में कमी आई है तथा जल प्रबंधन अधिक वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से सुदृढ़ हुआ है।इस परियोजना का सबसे बड़ा लाभ किसानों को मिला है। लगभग 29 लाख किसान प्रत्यक्ष रूप से इससे लाभान्वित हुए हैं। सिंचाई सुविधा उपलब्ध होने के बाद किसान अब केवल परंपरागत खेती तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दलहन, तिलहन, सब्जियों और नकदी फसलों की बहुफसली खेती की ओर अग्रसर हुए हैं। इससे किसानों की आय में वृद्धि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली है।सरयू नहर परियोजना की यात्रा लंबी और चुनौतीपूर्ण रही। मूल रूप से वर्ष 1982 में लगभग 299.20 करोड़ रुपये की लागत से स्वीकृत परियोजना की लागत समय के साथ बढ़ती गई। वर्ष 2002 में यह 2765.18 करोड़ रुपये, वर्ष 2010 में 7270.29 करोड़ रुपये और वर्ष 2017 में 9802.68 करोड़ रुपये तक पहुंची। अंतत: परियोजना की कुल लागत लगभग 10184.93 करोड़ रुपये रही। निर्माण के दौरान वन भूमि, रेलवे पुलों और राष्ट्रीय राजमार्गों से जुड़े तकनीकी एवं प्रशासनिक अवरोधों को विभिन्न विभागों के समन्वय से दूर किया गया।वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत इसे देश की 99 महत्वपूर्ण परियोजनाओं में शामिल किए जाने के बाद कार्यों में तेजी आई। केंद्र और राज्य सरकार के संयुक्त प्रयासों से परियोजना को गति मिली और 11 दिसंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा इसका लोकार्पण किया गया। यह पूर्वांचल के किसानों के लिए ऐतिहासिक क्षण साबित हुआ।इसी क्रम में प्रदेश सरकार ने सिंचाई को अधिक प्रभावी बनाने के लिए प्रेशर सिंचाई प्रणाली को भी बढ़ावा दिया है। पाइपलाइन आधारित यह आधुनिक प्रणाली कम जल में अधिक क्षेत्र की सिंचाई सुनिश्चित करती है। महाराजगंज जनपद के फरेंदा क्षेत्र स्थित मेहंदवा प्रेशर सिंचाई परियोजना के माध्यम से लगभग 445 हेक्टेयर भूमि पर 1780 किसानों को लाभ मिल रहा है। वहीं सिद्धार्थनगर के इटवा क्षेत्र में पडरिया प्रेशर सिंचाई प्रणाली के जरिए 454 हेक्टेयर क्षेत्र में 708 किसानों को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।प्रेशर सिंचाई प्रणाली पारंपरिक विधियों की तुलना में अधिक प्रभावी मानी जा रही है। इससे जल की बर्बादी कम होती है, कम लागत में अधिक क्षेत्र तक पानी पहुंचता है और सौर ऊर्जा आधारित व्यवस्था होने से ऊर्जा खर्च भी घटता है। प्रदेश में लगभग 31 किलोमीटर लंबी ऐसी प्रणालियों के माध्यम से 4405 हेक्टेयर भूमि सिंचित हो रही है, जिससे 57 गांवों के करीब 15,473 किसान लाभान्वित हो रहे हैं।प्रदेश सरकार का मानना है कि सरयू नहर राष्ट्रीय परियोजना और प्रेशर सिंचाई प्रणाली जैसे प्रयास न केवल कृषि उत्पादन बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं, बल्कि जल संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। आने वाले वर्षों में यह परियोजनाएं प्रदेश की कृषि उन्नति और किसान समृद्धि की मजबूत आधारशिला के रूप में स्थापित होंगी।
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