वाशिंगटन,27 मई। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा में पुनर्निर्माण के लिए बड़े जोर-शोर से गाजा शांति बोर्ड बनाया था, लेकिन इसका आधिकारिक कोष खाली पड़ा हुआ है।
रिपोर्ट के मुताबिक, गठन के 4 महीने बाद भी किसी देश ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई और विश्व बैंक द्वारा प्रबंधित और संयुक्त राष्ट्र द्वारा अनुमोदित वित्तीय कोष में एक डॉलर भी जमा नहीं हुआ है। ट्रंप ने बोर्ड को गाजा के पुनर्निर्माण का प्रबंधन करने के लिए बनाया था।
ट्रंप के इस बोर्ड में आजीवन सदस्यता की फीस 1 अरब डॉलर (करीब 9,550 करोड़ रुपये) निर्धारित की थी और इसे सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संगठन में एक बताया था। तब विभिन्न देशों ने इस बोर्ड के माध्यम से गाजा राहत के लिए लगभग 7 अरब डॉलर (करीब 67,000 करोड़ रुपये) देने का वादा किया था। तब ट्रंप ने अमेरिका की ओर से अतिरिक्त 10 अरब डॉलर (करीब 95,000 करोड़ रुपये) की सहायता का आश्वासन दिया था।
रिपोर्ट के मुताबिक, बोर्ड को दान मिला है, लेकिन देश विश्व बैंक के आधिकारिक कोष की जगह सीधे जेपी मॉर्गन खाते में पैसा जमा कर रहे हैं। जेपी मॉर्गन खाते पर अपने योगदानकर्ताओं और बोर्ड सदस्यों को वित्तीय स्थिति की रिपोर्ट करने का कोई दायित्व नहीं है, जबकि विश्व बैंक को गाजा फंड की वित्तीय स्थिति के बारे में योगदानकर्ताओं और बोर्ड के सदस्यों को रिपोर्ट देनी होती है। हालांकि, शांति बोर्ड उचित समय पर वित्तीय विवरणों की रिपोर्ट देगा।
रिपोर्ट में बोर्ड ऑफ पीस के एक अधिकारी के हवाले से बताया गया कि धन जुटाने के लिए कई विकल्प बनाए गए थे, जिसमें विश्व बैंक भी शामिल था, लेकिन दानदाताओं ने अन्य विकल्पों का उपयोग करना चुना है। अमेरिकी विदेश विभाग ने बोर्ड के एजेंडे में शामिल परियोजनाओं के लिए सहायता राशि में लगभग 1.2 अरब डॉलर (11,460 करोड़ रुपये) के पुनर्आवंटित करने की प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन अभी तक यह धनराशि खर्च नहीं की गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, मोरक्को ने 30 लाख डॉलर (करीब 28.65 करोड़ रुपये) और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने 2 करोड़ डॉलर (करीब 191 करोड़ रुपये) दान दिया है। दोनों राशियां प्रशासनिक खर्चों के लिए थीं। इसी पैसे से गाजा पर शासित फिलिस्तीनी तकनीकी समिति का वेतन भी दिया गया। यूएई ने गाजा में नए पुलिस बल को प्रशिक्षित करने के लिए 10 करोड़ डॉलर (करीब 960 करोड़ रुपये) दिए, लेकिन कार्यक्रम शुरू न होने से धनराशि रोक दी गई है।
बोर्ड में अब तक 25 देशों ने दिलचस्पी दिखाई है, जिसमें इजरायल, सऊदी अरब, पाकिस्तान, यूएई, मोरक्को, इंडोनेशिया, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन, हंगरी और वियतनाम शामिल हैं। इटली और दक्षिण कोरिया जैसे कई देशों ने केवल पर्यवेक्षक के रूप में भाग लिया। फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और कनाडा जैसी पश्चिमी देशों ने बोर्ड की संरचना पर चिंता जताते हुए इससे किनारा कर लिया। भारत बोर्ड की पहली बैठक में केवल पर्यवेक्षक के तौर पर शामिल हुआ, उसने इसे स्वीकार-अस्वीकार नहीं किया है।
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