लखनऊ 10 जून (आरएनएस ) डिजिटल परिवहन सेवाओं और ऐप आधारित टैक्सी-ऑटो क्षेत्र को लेकर जारी एक नए अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) कानून की धारा 9(5) को सब्सक्रिप्शन आधारित राइड-हेलिंग प्लेटफॉर्म पर लागू करने से लाखों ड्राइवरों की आय प्रभावित हो सकती है और आम यात्रियों के लिए यात्रा महंगी हो सकती है। नीति अनुसंधान संस्था एस्या सेंटर द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान स्वरूप में ऐसे प्लेटफॉर्म पर जीएसटी लागू करना कानूनी रूप से जटिल होने के साथ-साथ व्यवहारिक रूप से भी कठिन है।
‘बैलेंसिंग एफिशिएंसी एंड इक्विटी: एविडेंस फ्रॉम इंडियाज़ टेक्नोलॉजी-इंटरमीडिएटेड ट्रांसपोर्ट सर्विसेज अंडर द जीएसटी रिजीमÓ शीर्षक से जारी इस अध्ययन में देश के 13 शहरों के 1,044 ड्राइवरों और 1,059 यात्रियों से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट में तेजी से लोकप्रिय हो रहे सॉफ्टवेयर-एज-ए-सर्विस (सास) आधारित मॉडल का अध्ययन किया गया है, जिसमें प्लेटफॉर्म केवल चालक और यात्री के बीच संपर्क स्थापित करने का कार्य करता है। इस व्यवस्था में चालक प्लेटफॉर्म को निश्चित सदस्यता शुल्क देता है, जबकि किराया स्वयं निर्धारित करता है, भुगतान सीधे प्राप्त करता है और पूरी आय अपने पास रखता है।रिपोर्ट के अनुसार यह मॉडल पारंपरिक कमीशन आधारित व्यवस्था से पूरी तरह अलग है, क्योंकि इसमें प्लेटफॉर्म न तो किराया तय करता है और न ही भुगतान प्रक्रिया का संचालन करता है। ऐसे में धारा 9(5) के अंतर्गत इन सेवाओं पर जीएसटी लागू करने से कई कानूनी और प्रशासनिक चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं। अध्ययन में यह भी कहा गया है कि अधिकांश चालक जीएसटी पंजीकरण की निर्धारित वार्षिक आय सीमा से नीचे आते हैं, जिससे इस व्यवस्था को लागू करना और अधिक जटिल हो जाता है।रिपोर्ट में विभिन्न राज्यों के अग्रिम निर्णय प्राधिकरणों द्वारा दिए गए अलग-अलग फैसलों का भी उल्लेख किया गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि समान कारोबारी मॉडल होने के बावजूद अलग-अलग राज्यों में भिन्न कर व्यवस्था लागू होने से अनिश्चितता बढ़ रही है और प्रतिस्पर्धा का संतुलन प्रभावित हो रहा है। इससे डिजिटल परिवहन क्षेत्र में काम कर रही कंपनियों के लिए समान अवसरों का वातावरण कमजोर पड़ सकता है।एस्या सेंटर की निदेशक मेघना बाल ने कहा कि भारत का परिवहन क्षेत्र तेजी से बदल रहा है और नए प्लेटफॉर्म मॉडल चालकों तथा यात्रियों दोनों को अधिक विकल्प और पारदर्शिता प्रदान कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सदस्यता आधारित मॉडल चालकों को आय का पूर्वानुमान लगाने में मदद करता है तथा यात्रियों को किफायती सेवाएं उपलब्ध कराता है। उनके अनुसार बदलती तकनीक के अनुरूप कर और कानूनी ढांचे को भी अद्यतन करने की आवश्यकता है।कर विशेषज्ञों का भी मानना है कि डिजिटल परिवहन सेवाओं के विकास ने अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। ईवाई की कर भागीदार जयश्री पार्थसारथी ने कहा कि जैसे-जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म सदस्यता आधारित मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे कर नीतियों को भी नए व्यावसायिक ढांचे के अनुरूप विकसित करना आवश्यक हो गया है।अध्ययन में सामने आया है कि यदि इन सेवाओं पर अतिरिक्त जीएसटी लागू किया जाता है तो इसका सबसे बड़ा प्रभाव चालकों की आय पर पड़ेगा। सर्वेक्षण में शामिल तीन-चौथाई से अधिक चालकों ने आशंका जताई कि इससे उनकी आजीविका प्रभावित होगी। लगभग 80 प्रतिशत चालकों का मानना है कि उनकी वास्तविक आय में कमी आएगी, जबकि 60 प्रतिशत से अधिक को बुकिंग घटने की चिंता है। करीब 45 प्रतिशत चालकों को लगता है कि किराया बढऩे से यात्री कम हो जाएंगे और लगभग 40 प्रतिशत ने संकेत दिया कि वे ऐप आधारित सेवाओं के बजाय सीधे यात्रियों से संपर्क कर यात्रा सेवाएं देना शुरू कर सकते हैं।रिपोर्ट में यात्रियों पर पडऩे वाले संभावित प्रभावों का भी उल्लेख किया गया है। अध्ययन के अनुसार यदि किराए में केवल पांच प्रतिशत की वृद्धि भी होती है तो लगभग 68 प्रतिशत यात्री ऐप आधारित सेवाओं का उपयोग कम कर सकते हैं। आधे से अधिक यात्रियों ने कहा कि वे पुन: पारंपरिक ऑटो और टैक्सी सेवाओं की ओर लौट सकते हैं। विशेष रूप से महिलाओं, कम आय वर्ग के लोगों और देर रात यात्रा करने वाले यात्रियों पर इसका अधिक प्रभाव पडऩे की आशंका व्यक्त की गई है।अध्ययन में यह भी सामने आया कि लगभग 90 प्रतिशत यात्रियों के लिए ऐप आधारित सेवाओं में उपलब्ध सुरक्षा सुविधाएं अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में यदि इन सेवाओं का उपयोग घटता है तो यात्रियों को सुरक्षा और सुविधा के स्तर पर भी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आई है जब सरकार और उद्योग जगत चालक-केंद्रित परिवहन मॉडल विकसित करने पर विचार कर रहे हैं। ‘भारत टैक्सीÓ जैसी नई पहलें चालक की आय में पारदर्शिता और आर्थिक सशक्तीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी पहलों को प्रोत्साहित करने के लिए स्पष्ट और व्यावहारिक कर नीति आवश्यक है।एस्या सेंटर ने अपनी सिफारिशों में कहा है कि जीएसटी कानून की धारा 9(5) केवल उन मामलों में लागू की जानी चाहिए जहां प्लेटफॉर्म किराया निर्धारण या भुगतान प्रक्रिया पर प्रत्यक्ष नियंत्रण रखता हो। रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि यात्रियों की सुरक्षा, यात्रा निगरानी और चालक सत्यापन जैसी गतिविधियों को कर निर्धारण के लिए व्यवसायिक नियंत्रण का आधार नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि ये सार्वजनिक सुरक्षा और नियामकीय अनुपालन से जुड़े दायित्व हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ परिवहन क्षेत्र में नई तकनीकों और व्यावसायिक मॉडलों का विकास जारी रहेगा। ऐसे में कर नीतियों को इस प्रकार विकसित करना होगा कि नवाचार, उपभोक्ता हित और राजस्व व्यवस्था के बीच संतुलन बना रहे तथा चालक और यात्री दोनों को अनावश्यक आर्थिक बोझ का सामना न करना पड़े।
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