जबलपुर 10 जून (आरएनएस)। जबलपुर में एक दुर्लभ और जानलेवा बीमारी से पीडि़त 30 वर्षीय युवक का सफल इलाज बिना बड़ी सर्जरी के एंडोस्कोपिक तकनीक से किया गया। चिकित्सकों के अनुसार मरीज रोशन जॉर्ज को एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस (पैंक्रियास में तीव्र सूजन) के बाद डिस्कनेक्टेड पैंक्रियाटिक डक्ट सिंड्रोम (ष्ठक्कष्ठस्) हो गया था, जो गंभीर जटिलताओं और मृत्यु का कारण बन सकता है।
गैस्ट्रो न्यूरो क्लिनिक, जबलपुर के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. आलोक बंसल ने बताया कि पैंक्रियाटाइटिस के दौरान पैंक्रियास के आसपास नेक्रोटिक कलेक्शन बनने से कई बार पैंक्रियाटिक डक्ट (नली) बीच से क्षतिग्रस्त होकर अलग हो जाती है। ऐसी स्थिति में पैंक्रियाटिक जूस छोटी आंत में जाने के बजाय पेट अथवा फेफड़ों में रिसने लगता है। इससे लगातार बुखार, तेज हृदयगति, सांस फूलना, दस्त, भूख न लगना, वजन कम होना और गंभीर संक्रमण जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। समय पर इलाज न मिलने पर यह स्थिति जानलेवा भी साबित हो सकती है।
डॉ. बंसल ने बताया कि परंपरागत उपचार में कई बार पैंक्रियास के क्षतिग्रस्त हिस्से को सर्जरी द्वारा निकालना पड़ता है। इसके बाद मरीज को जीवनभर भोजन पचाने के लिए एंजाइम की दवाएं तथा इंसुलिन लेने की आवश्यकता पड़ सकती है।
जांच में सामने आई दुर्लभ जटिलता
रोशन जॉर्ज का प्रारंभिक उपचार अन्य अस्पताल में चल रहा था, लेकिन अपेक्षित सुधार नहीं होने पर उन्हें गैस्ट्रो न्यूरो क्लिनिक लाया गया। इलाज के दौरान उनकी ऑक्सीजन कम होने लगी। छाती के एक्स-रे में दाएं फेफड़े में 25 प्रतिशत से अधिक पानी भरा मिला, जबकि सामान्यत: पैंक्रियाटाइटिस में बाएं अथवा दोनों फेफड़ों में द्रव भरता है। साथ ही पैंक्रियास के हेड भाग में नेक्रोटिक कलेक्शन भी पाया गया।
इन संकेतों के आधार पर चिकित्सकों ने डिस्कनेक्टेड पैंक्रियाटिक डक्ट सिंड्रोम की आशंका जताई, जिसकी पुष्टि आगे की जांच में हुई।
श्वक्रष्टक्क से बिना ऑपरेशन किया सफल उपचार
मरीज के पेट और फेफड़ों में लगातार द्रव भर रहा था तथा पैंक्रियाटिक जूस आंत में न जाकर शरीर के अन्य हिस्सों में रिस रहा था। आपात स्थिति में पहले फेफड़े से द्रव निकाला गया, इसके बाद ईआरसीपी (श्वक्रष्टक्क) प्रक्रिया की गई।
डॉ. बंसल ने बताया कि इस तकनीक में एंडोस्कोपी के माध्यम से पैंक्रियाटिक डक्ट में तार पहुंचाकर टूटे हुए दोनों सिरों को जोडऩा पड़ता है। यह अत्यंत जटिल और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया होती है। लगभग 25 से 30 प्रयासों के बाद चिकित्सकों ने डक्ट के दोनों हिस्सों को सफलतापूर्वक ब्रिज करते हुए स्टेंट स्थापित किया।
स्टेंट लगते ही पैंक्रियाटिक जूस का प्रवाह पुन: छोटी आंत में शुरू हो गया। इसके बाद धीरे-धीरे पेट और फेफड़ों में भरा द्रव कम होने लगा, बुखार और दस्त बंद हो गए तथा मरीज का भोजन सामान्य रूप से पचने लगा। पैंक्रियास के हेड भाग में मौजूद नेक्रोटिक कलेक्शन भी लगातार कम होता गया।
लगातार फॉलोअप से मिली पूरी सफलता
स्वास्थ्य में सुधार के बाद मरीज को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई, लेकिन अगले कुछ सप्ताह तक नियमित फॉलोअप, दवाओं में आवश्यक बदलाव, एंटीबायोटिक इंजेक्शन और विशेष आहार संबंधी सलाह दी जाती रही।
करीब 40 से 45 दिन के उपचार और निगरानी के बाद मरीज अब पूरी तरह स्वस्थ है। चिकित्सकों का कहना है कि समय पर सही निदान और सफल एंडोस्कोपिक उपचार के कारण बड़ी सर्जरी की आवश्यकता नहीं पड़ी, जिससे पैंक्रियास को सुरक्षित रखा जा सका तथा भविष्य में इंसुलिन पर निर्भरता और अन्य जटिलताओं से भी बचाव संभव हुआ।
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