0 पढ़े-लिखे लोग ही नक्सल लीडर क्यों बनें? इस पर सरकार मंथन करें
रायपुर, 17 जून (आरएनएस)। अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से नक्सलवादी हिंसा के चलते आम जनता और पुलिस फोर्स के जवान शहीद हुए। ज्यादातर नक्सली लीडरों में पढ़े-लिखे लोग जैसे डॉक्टर, इंजीनियर और प्रोफेसर जैसे लोग शामिल थे। सरकार को नक्सलियों के आत्मसमर्पण के बाद इस विषय पर मंथन करना चाहिए। क्यों पढ़ा लिखा वर्ग नक्सली हिंसा को समर्थन करता रहा। नक्सलवाद अब बस्तर से खत्म हो गया है लेकिन उसकी जगह पुलिस राज शुरू हो गया है। जहां पर पुलिस आम जनता और पत्रकारों को अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक लगाकर प्रताडि़त कर रही है। उक्त जानकारी प्रेसक्लब रायपुर में मध्यप्रदेश से निकलने वाले दबंग केसरी समाचार पत्र के सुकमा ब्यूरो चीफ धनंजन कुमार सिंह ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद खत्म होने के बाद भी अब तक झीरम घाट हत्याकांड का सच सामने क्यों नहीं आया है। वे ईमानदारी से भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखते रहे हैं। जिसकी सजा उनके खिलाफ सुकमा पुलिस प्रशासन द्वारा एफआईआर दर्ज कर जेल भेजकर दी गई है। उन्होंने समझौता नहीं किया, अपितु सच सामने लाने के लिए प्रधानमंत्री सड़क योजना एवं राशन घोटाला सहित अनेक मुद्दों पर निर्भीकता के साथ समाचार बनाए। उसकी सजा उन्हें 2017 से मिल रही है। भाजपा-कांग्रेस दोनों के शासनकाल में मुख्यमंत्रियों को ज्ञापन देने के उपरांत भी सुकमा की जनता को इंसाफ नहीं मिला है। प्रधानमंत्री-गृहमंत्री सहित उन्होंने राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजकर बस्तर में होने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ अनेक शिकायतें की है। इसके बाद भी कार्यवाही नहीं हुई है।
एस.शर्मा
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