गोरखपुर 17 जून (आरएनएस)। अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर महायोगी गुरु गोरखनाथ योग गोरखनाथ मन्दिर गोरखपुर एवं महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद् गोरखपुर द्वारा आयोजित साप्ताहिक योग शिविर एवं शैक्षिक कार्यशाला के तीसरे दिन गोरखनाथ मंदिर स्थित महन्त दिग्विजय नाथ स्मृति सभागार में ‘मुद्रा एवं बन्धÓ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया।संगोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा आयुष विभाग गोरखपुर के चिकित्सक एवं नाथयोग एवं नेचुरोपैथी सेन्टर के निदेशक प्रसिद्ध योगाचार्य डॉ.जयन्तनाथ ने कहा कि गोरखनाथ जी की हठयोग साधना में मुद्रा एवं बंध का महत्वपूर्ण स्थान है। यौगिक मुद्राएँ चित्त को एकाग्र कर प्रसन्नता प्रदान करती है। मुद्राएँ भौतिक शरीर को निरोगी बनाने के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति का साधन बनती हैं। घेरण्ड संहिता में बताया गया है कि खेचरी मुद्रा से व्यक्ति जरा और मरण पर विजय प्राप्त कर लेता है। शरीर के अंदर होने वाली अनेक प्रकार की गतिविधियों को हम मुद्रा द्वारा नियंत्रित करते हैं। मुद्राओं के अभ्यास से साधक कुण्डलिनी का जागरण करके सहजावस्था को प्राप्त कर लेता है।बन्ध को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि यह शरीर के अन्दर प्राण के? वेग को रोककर उसे सही दिशा में लगाता है जिससे पिण्ड अर्थात शरीर की शुद्धि होती है। जालन्धर बन्ध, उड्डीयान बन्ध और मूल बन्ध इन तीनों का समायोजन होना हीं महाबन्ध है। बन्ध का अभ्यास करने से हमारे तंत्रिका तंत्र का विकास होता है तथा इसके द्वारा ब्लड सर्कुलेशन भी ठीक रहता है। थायराइड ग्रंथि की सभी प्रकार की समस्याओं के लिए जालंधर बंध का अभ्यास करना चाहिए। पेट से संबंधित समस्याओं से निजात पाने के लिए उड्डीयान बन्ध का अभ्यास करना चाहिए इससे आंत की सफाई हो जाती हैसहवक्ता के रूप में महायोगी गुरु गोरक्षनाथ शोधपीठ दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर के निदेशक प्रो. कुशलनाथ मिश्र ने कहा कि शरीर मन और आत्मा का समन्वय करने के लिए मुद्रा एवं बंध एक वैज्ञानिक विधि है। मुद्रा के द्वारा हम आनंद की प्राप्ति करते हैं। मुद्रा और बंध के सही अभ्यास से अणिमा, महिमा आदि अष्ट सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं। इससे देवताओं को भी प्रसन्न किया जाता है। इसका अभ्यास करने वाले को मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। गोरखनाथ ने आठ मुद्राओं का वर्णन किया है।उन्होंने कहा कि जालंधर बंध और उड्डीयान बंध से हमें थकान कम लगती है। इससे हमारे शरीर के अनेक प्रकार के हारमोंस का संतुलन होता है। इसका अभ्यास किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। प्रास्ताविकी करते हुए गोरक्षनाथ संस्कृत विद्यापीठ के आचार्य डॉ. प्रांगेश मिश्र ने कहा कि मन एवं प्राण अत्यंत चंचल है। उनके नियंत्रण के बिना साधक अपनी साधना में सफल नहीं हो सकता है इसलिए मुद्रा एवं बंध का ज्ञान आवश्यक है। मुद्रा के द्वारा हमारा मन नियंत्रित होता है और बंध के द्वारा प्राण का नियंत्रण होता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री गोरखनाथ मंदिर के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ जी ने किया।कार्यक्रम का प्रारंभ अतुल कुमार तिवारी के वैदिक मंगलाचरण से हुआ। कार्यक्रम का संचालन श्री गोरक्षनाथ संस्कृत विद्यापीठ के आचार्य डॉ .दिग्विजय शुक्ल ने किया।महायोगी गुरु गोरखनाथ योग संस्थान के योग प्रशिक्षक नवनीत चौधरी ने सभी अतिथियों एवं श्रोताओं का आभार ज्ञापन किया।इस अवसर पर आचार्य डॉ. रोहित मिश्र, योगप्रशिक्षक कमलेश मौर्य, दीपनारायण, बृजेश मणि मिश्र, पुरुषोत्तम चौबे, शशिकुमार, रवि
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