नईदिल्ली,22 जून। भारत सरकार के दूरसंचार विभाग ने दूरसंचार नियम, 2026 का ड्राफ्ट जारी किया है. इसके तहत देश में सैटेलाइट कम्युनिकेशंस सेवाएं शुरू करना अब आसान नहीं होगा. नए नियमों के मुताबिक, एलन मस्क की स्टारलिंक, जियो सैटकॉम और यूटेलसैट वनवेब जैसी वैश्विक और घरेलू कंपनियों को व्यावसायिक परिचालन शुरू करने के लिए केवल दूरसंचार विभाग का लाइसेंस मिलना ही काफी नहीं होगा, बल्कि उन्हें कई स्तरों पर कड़ी सुरक्षा मंजूरियों से गुजरना होगा.
इस ड्राफ्ट नीति की सबसे बड़ी बात यह है कि कंपनियों को प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत रेडियो तरंगें (स्पेक्ट्रम) मिलने के बाद भी अंतिम उपभोक्ता तक सेवा पहुंचाने के लिए सरकार से अलग से सुरक्षा मंजूरी लेनी होगी. नियमों के अनुसार, यदि केंद्र सरकार ने आवश्यक उपकरण लगाने की मंजूरी से पहले किसी कंपनी को लेटर ऑफ इंटेंट जारी भी कर दिया है, तो भी स्पेक्ट्रम आवंटन तभी वैध माना जाएगा जब सभी आवश्यक सुरक्षा जांचें पूरी हो जाएंगी. इसके बाद ही कंपनियां आम जनता के लिए सैटेलाइट फोन और ब्रॉडबैंड सेवाएं शुरू कर पाएंगी.
वित्तीय ढांचे की बात करें तो सैटेलाइट कंपनियों को स्पेक्ट्रम के लिए नीलामी की प्रक्रिया से नहीं गुजरना होगा. सरकार इन्हें प्रशासनिक प्रक्रिया के जरिए रेडियो तरंगें आवंटित करेगी. इसके लिए कंपनियों को 30,000 रुपये से लेकर 50 लाख रुपये तक का वार्षिक शुल्क देना होगा. यह शुल्क सेवा के प्रकार और प्रति-टर्मिनल के आधार पर तय किया जाएगा. इसके अलावा 1,000 रुपये का नॉन-रिफंडेबल आवेदन शुल्क भी लागू होगा. हालांकि, स्पेक्ट्रम की वास्तविक दरें बाजार मूल्य के आधार पर ही तय की जाएंगी.
ड्राफ्ट नियमों में नेटवर्क कनेक्टिविटी को लेकर भी बेहद सख्त रुख अपनाया गया है. नए नियमों के तहत कोई भी सैटेलाइट कंपनी सरकार की लिखित अनुमति के बिना अपने सैटेलाइट नेटवर्क को देश के मौजूदा सार्वजनिक टेलीकम्युनिकेशन नेटवर्क से नहीं जोड़ सकती. इसका मतलब है कि ये कंपनियां सामान्य लैंडलाइन, पब्लिक स्विच्ड टेलीफोन नेटवर्क, पब्लिक लैंड मोबाइल नेटवर्क और स्टैंडर्ड इंटरनेट नेटवर्क से सीधे कनेक्ट नहीं हो पाएंगी.
दूरसंचार विभाग ने इस ड्राफ्ट को 17 जून, 2026 को अधिसूचित किया है. सरकार ने सभी संबंधित पक्षों और आम जनता को इस पर अपने विचार और सुझाव देने के लिए 30 दिनों का समय दिया है. इस अवधि के बाद प्राप्त फीडबैक के आधार पर ही अंतिम रूपरेखा तैयार की जाएगी. इन सख्त नियमों के कारण भारत में सैटेलाइट इंटरनेट के कमर्शियल लॉन्च में अभी और देरी होने की संभावना है.
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