नई दिल्ली, 22 जून (आरएनएस)। हाल ही में, 14 मई को अमेरिकी सीनेट की बैंकिंग कमेटी ने ‘डिजिटल एसेट मार्केट क्लैरिटी एक्ट’ को मंज़ूरी दे दी है। इसके साथ ही अमेरिका क्रिप्टो मार्केट के लिए अपना पहला व्यापक नियम-कानून बनाने के बेहद करीब पहुँच गया है। इस बिल ने बैंकों, क्रिप्टो कंपनियों और रेगुलेटर्स का ध्यान अपनी ओर खींचा है, लेकिन इसका असर सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है। दुनिया भर के क्रिप्टो उद्योग और सरकारों के लिए यह एक्ट एक बड़ा संकेत है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था में अमेरिकी डॉलर की भूमिका कैसे बदल रही है।
आज चलन में मौजूद सभी स्टेबलकॉइन्स में से 97% से भी ज़्यादा अमेरिकी डॉलर की कीमत से जुड़े हैं। इन डिजिटल टोकन्स की कीमत को स्थिर रखने के लिए मुख्य रूप से अमेरिकी सरकारी बॉन्ड्स (US Treasury bills) को गारंटी के तौर पर रखा जाता है। साल 2025 में पास हुए अमेरिकी ‘GENIUS एक्ट’ के तहत, स्टेबलकॉइन जारी करने वाली कंपनियों के लिए इन सरकारी सेक्योरिटीज में रिज़र्व रखना अनिवार्य कर दिया गया था। इस रिज़र्व पर मिलने वाले ब्याज से ही इन कंपनियों को अपने टोकन्स को बढ़ावा देने और बाज़ार में उनकी पहुँच बढ़ाने में मदद मिलती है। इसका सीधा नतीजा यह है कि जब वियतनाम, नाइजीरिया या भारत में कोई व्यक्ति डॉलर-आधारित स्टेबलकॉइन खरीदता है, तो वह असल में एक ‘डिजिटल डॉलर’ ही अपने पास रख रहा होता है। स्टेबलकॉइन कंपनियों के लिए साफ़ और स्पष्ट नियम बनाकर, यह क्लैरिटी एक्ट डॉलर स्टेबलकॉइन के पूरे इकोसिस्टम को दुनिया भर के बाज़ारों में इस्तेमाल के लिए और भी आसान बना देता है।यही वजह है कि दुनिया भर की सरकारों ने अब इस पर कदम उठाना शुरू कर दिया है। यूरोपीय संघ के ‘मीका’ (MiCA) नियम कानून ने अपने क्षेत्र में पेमेंट के लिए गैर-यूरो स्टेबलकॉइन्स के इस्तेमाल पर कुछ पाबंदियाँ लगाई हैं, ताकि उनकी अपनी करेंसी ‘यूरो’ का दबदबा बना रहे। फ्रांस ने यूरो से जुड़े स्टेबलकॉइन्स को बढ़ावा दिया है, तो वहीं दक्षिण कोरिया ने अपनी स्थानीय करेंसी ‘वॉन’ पर आधारित स्टेबलकॉइन को अपनी प्राथमिकता बनाते हुए अपने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया है। हाँगकाँग ने भी अपने रेगुलेटेड सिस्टम के तहत पारंपरिक बैंकों को स्थानीय करेंसी से जुड़े स्टेबलकॉइन जारी करने का पहला लाइसेंस दे दिया है। भारत को भी जल्द ही अपने नियमों में ऐसे ही सवालों के जवाब ढूंढने होंगे। यह क्लैरिटी एक्ट इन चुनौतियों को खत्म नहीं करता, बल्कि डॉलर स्टेबलकॉइन सिस्टम को कानूनी मजबूती और स्पष्टता देकर इन्हें और भी गंभीर बना देता है। यही वजह है कि दुनिया भर के कई रेगुलेटर्स अब अमेरिका के फैसले का इंतज़ार नहीं कर रहे हैं; वे डिजिटल दौर में अपनी मौद्रिक संप्रभुता को बचाने और डॉलर के विकल्प तैयार करने की रेस में पहले ही आगे बढ़ चुके हैं।
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