नई दिल्ली,24 जून(आरएनएस)। भारत तीन दशकों से ग्रीन बूट्स के नाम से मशहूर एवरेस्ट पर्वतारोही के अवशेष बरामद करने के लिए एक मिशन की तैयारी कर रहा है. डीएनए टेस्टिंग से पता चला है कि वह एक भारतीय सैनिक था.
सूत्रों को मिले डॉक्यूमेंट्स से यह पता चला है.
बर्फ में जमा हुआ यह शव एवरेस्ट पर आसानी से पहचाने जाने योग्य स्थलचिह्न में से एक बन गया है, जो नेपाल और तिब्बत की सीमा पर है.
यह शव, जिसका नाम पर्वतारोही के पहने हुए खास लाइम-कलर बूट्स के नाम पर रखा गया है, मई 1996 से लगभग 8,500 मीटर (27,887 फीट) की ऊंचाई पर एक गुफा में पड़ा है, जब दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ पर एक भयानक बर्फीले तूफान में आठ पर्वतारोहियों की मौत हो गई थी.
लंबे समय तक माना जा रहा था कि पर्वतारोही की पहचान भारतीय सुरक्षा बल इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी) के त्सेवांग पलजोर के तौर पर हुई है. इसके बजाय, आईटीबीपी ने कहा कि उसने पुष्टि की है कि यह पलजोर का सहकर्मी, दोर्जे मोरुप था, जो एवरेस्ट की कठिन चढ़ाई पर पलजोर के दो साथियों में से एक था.
आईटीबीपी ने रिट्रीवल ऑपरेशन (बचाव अभियान) के लिए बोलियों के लिए एक टेंडर निकाला है, जिसमें कहा गया है कि उसने 2024 में किए गए पहले की सत्यापन प्रक्रिया से पुष्टि की थी कि यह मोरुप था. भारत सरकार की साइट पर पोस्ट किए गए डॉक्यूमेंट्स में उस खोज यात्रा की जानकारी दी गई है, जिसमें कहा गया है कि डीएनए सैंपल इक_ा करना शामिल था. यह पहली बार है जब अधिकारियों ने औपचारिक तौर पर शव की पहचान बताई है.
ऊंचाई पर से शवों को निकालना एक बड़ा मिशन है, जिसके लिए कई पर्वतारोही की जरूरत होती है. 1920 के दशक में शुरू हुई खोज यात्रा के बाद से पहाड़ पर 300 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं, और कई शव अभी भी ऊपर पर मौजूद हैं. कई बर्फ में छिप गए हैं या गहरी दरारों में समा गए हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ के पिघलने से कुछ शव उभरने लगे हैं.
कुछ नाम, जैसे ग्रीन बूट्स, उन पर्वतारोहियों ने दिए हैं जो चोटी पर चढऩे की अपनी कोशिश में उनसे आगे निकल जाते हैं.
ब्रिटिश पर्वतारोही जॉर्ज मैलोरी, जो 1924 में चोटी पर चढऩे की कोशिश के दौरान लापता हो गए थे, उनकी बॉडी 1999 में मिली. उनके साथ चोटी पर चढऩे गए पर्वतारोही एंड्रयू इरविन, कभी नहीं मिले — और न ही उनका कैमरा, जो चोटी पर फतह पाने का सबूत दे सकता है जो पर्वतारोहण के इतिहास को फिर से लिख सकता है.
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