बिलासपुर, 01 जुलाई (आरएनएस)। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 16 साल पुराने रिश्वत मामले में एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) को बड़ा झटका दिया है। हाईकोर्ट ने तत्कालीन सहायक संचालक (शिक्षा) अनिल मारकंडे और लिपिक रमेश कुमार चौहान को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। न्यायमूर्ति रजनी दुबे की एकलपीठ ने बेमेतरा विशेष न्यायालय के 8 सितंबर 2017 के दोषसिद्धि आदेश को निरस्त करते हुए दोनों को संदेह का लाभ दिया।
मामला अक्टूबर 2010 का है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसकी शिक्षाकर्मी पत्नी का रुका हुआ वेतन जारी करने के बदले 5 हजार रुपये की रिश्वत मांगी गई थी। शिकायत के बाद एसीबी ने ट्रैप कार्रवाई की और सहायक संचालक अनिल मारकंडे की जेब से रासायनिक पाउडर लगे नोट बरामद किए थे। इसके आधार पर दोनों आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि रिश्वत मांगने के सबसे अहम साक्ष्य के रूप में पेश की गई ऑडियो रिकॉर्डिंग विश्वसनीय नहीं थी। रिकॉर्डिंग वाला उपकरण कई दिनों तक शिकायतकर्ता के पास रहा, जिससे उसमें छेड़छाड़ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। न तो आरोपियों और न ही शिकायतकर्ता के वॉयस सैंपल लिए गए, न रिकॉर्डिंग की फॉरेंसिक जांच कराई गई और न ही भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र पेश किया गया।
कोर्ट ने यह भी माना कि सह-आरोपी रमेश कुमार चौहान की मौके पर मौजूदगी साबित नहीं हुई और उससे कोई रिश्वत की रकम भी बरामद नहीं हुई। वहीं, रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि शिकायतकर्ता और उसकी पत्नी को शिकायत दर्ज होने से पहले ही वेतन का चेक मिल चुका था, जिससे शिकायत की परिस्थितियों पर भी सवाल खड़े हुए।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि केवल रिश्वत की रकम की बरामदगी दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है। अभियोजन पक्ष को रिश्वत मांगने और उसे स्वीकार करने, दोनों तथ्यों को संदेह से परे साबित करना होता है। चूंकि ्रष्टक्च ऐसा करने में विफल रही, इसलिए दोनों आरोपियों को बरी कर दिया गया।
०००
अपनी भाषा में समाचार चुनने की स्वतंत्रता | देश की श्रेष्ठतम समाचार एजेंसी

