नकुल कुमार मंडल
कोलकाता 13 नवंबर (आरएनएस)। अस्वस्थता के कारण राजनीति ही नहीं सार्वजनिक जीवन से दूर वरिष्ठ नेता मुकुल रॉय भले ही अपनी शारिरिक हालात के कारण यह नहीं समझ सके की उनपर कानून की गाज गिरी है। लेकिन सच तो यह है कि लम्बे समय तक राजनीति के माहिर खिलाड़ी वरिष्ठ नेता मुकुल रॉय को कलकत्ता हाईकोर्ट ने दलबदल विरोधी कानून के तहत पश्चिम बंगाल विधानसभा से अयोग्य घोषित कर दिया है। मुकुल रॉय 2021 में भाजपा के टिकट पर जीते थे, लेकिन बाद में टीएमसी में शामिल हो गए थे। विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी की याचिका पर अदालत ने यह फैसला सुनाया, जिसमें रॉय को अयोग्य घोषित करने की मांग की गई थी। अदालत ने विधानसभा अध्यक्ष बिमान बनर्जी के फैसले को चुनौती दी, जिसमें रॉय को अयोग्य घोषित करने की याचिका खारिज कर दी गई थी।बता दें कि न्यायमूर्ति देबांगसु बसाक की अध्यक्षता वाली एक खंडपीठ ने विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी और भाजपा विधायक अंबिका रॉय की याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए रॉय को राज्य विधानसभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित कर दिया। स्पीकर बिमान बनर्जी ने मुकुल रॉय की अयोग्यता पर निर्णय लेने में देरी की थी, जिसे अदालत ने ‘पक्षपातीÓ रवैया बताया। मुकुल रॉय का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा है। नवंबर 2017 में वे तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे। बाद में उनके बेटे शुभ्रांग्शु रॉय ने भी भाजपा का दामन थामा। पार्टी में योगदान को देखते हुए 2020 में मुकुल रॉय को भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया। 2021 के विधानसभा चुनाव में वे बिना ज़्यादा प्रचार किए ही कृष्णानगर उत्तर से बड़े अंतर से जीते, लेकिन चुनावों के बाद अचानक फिर से तृणमूल कांग्रेस में लौट आए। बहरहाल हाईकोर्ट के फैसले के बाद विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने कहा, यह ऐतिहासिक फैसला है। यह वही याचिका है जो मैंने विपक्ष के नेता की हैसियत से दायर की थी। माननीय अदालत ने मुकुल रॉय को अयोग्य ठहराते हुए स्पीकर द्वारा दिए गए पक्षपाती आदेश को भी रद्द कर दिया है। भले ही देर लगे, लेकिन सत्य की ही जीत होती है। बता दे कि कलकत्ता हाईकोर्ट का यह फैसला भारत के इतिहास में पहली बार हुआ है कि किसी उच्च न्यायालय ने किसी विधायक को “पार्टी विरोधी” गतिविधियों के आरोप में अयोग्य ठहराया है।

