-राष्ट्र निर्माण में भारतीय संविधान की भूमिका पर विधि विभाग में गोष्ठी
अयोध्या 26 नवंबर (आरएनएस )। डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय, अयोध्या के विधि विभाग में संविधान दिवस के उपलक्ष्य में राष्ट्र निर्माण में भारतीय संविधान की भूमिका विषय पर एक सारगर्भित गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विश्वविद्यालय के कुलपति कर्नल डॉ. बिजेंद्र सिंह रहे। कार्यक्रम में विधि संकाय के प्राध्यापकों ने संविधान के दार्शनिक, नैतिक एवं राष्ट्रनिर्माण संबंधी आयामों पर अपने विचार व्यक्त किए।
कुलपति डॉ. बिजेंद्र सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय संविधान केवल शासन-प्रणाली का विधान नहीं, अपितु राष्ट्र की आत्मा का दार्शनिक प्रकाश है। यह ग्रंथ नागरिकों को अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यबोध की ओर उन्मुख करता है। उन्होंने कहा कि संविधान का अनुशीलन प्रत्येक नागरिक के लिए अनिवार्य है, क्योंकि यही राष्ट्र की एकता, अखंडता और प्रगति का आधार है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे संविधान के आदर्शों को जीवन में व्यवहार रूप में परिणत करें। राष्ट्रनिर्माण में युवा शक्ति का योगदान संविधान-समन्वित विचारधारा से ही संभव है।
कार्यक्रम में बोलते हुए कला संकायाध्यक्ष प्रो. आशुतोष सिन्हा ने कहा कि भारतीय संविधान आदर्श शासन, उत्तरदायित्व और नैतिक राज्य-व्यवस्था का सुसंगत स्वरूप है। उन्होंने कहा कि संविधान भारतीय चिंतन-परंपरा की उदारता, मानवता और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतिबिम्ब है। उन्होंने बताया कि शिक्षा-संस्थानों का दायित्व है कि वे विद्यार्थियों में संवैधानिक चेतना और उत्तरदायी नागरिकता का संस्कार स्थापित करें। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्र का विकास तभी संभव है जब नागरिक संविधान के प्रति श्रद्धा और अनुशासन बनाए रखें। विधि संकायाध्यक्ष प्रो. अशोक कुमार राय ने कहा कि भारतीय संविधान न्याय, समता और स्वतंत्रता के शाश्वत मूल्यों का जीवन-संग्रह है। राष्ट्र के संचालन में संविधान की भूमिका केवल विधिक नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक भी है। उन्होंने कहा कि विधि के विद्यार्थियों का दायित्व है कि वे संविधान के उद्देशिक तत्वों को चरितार्थ करते हुए समाज में न्याय-संतुलन स्थापित करें। संविधान में निहित नैतिकता शासन-व्यवस्था की धुरी है। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे संविधान को केवल पाठ्य-वस्तु न मानकर जीवन-दृष्टि बनाएं।
प्रो. अजय कुमार सिंह ने कहा कि संविधान राष्ट्र के नैतिक, विधिक और सामाजिक आदर्शों का समन्वित दस्तावेज है। इसमें निहित मूल्यों की प्रतिष्ठा बिना नागरिक-संवेदना के संभव नहीं। उन्होंने कहा कि न्याय और नीति तभी सार्थक होती है जब उनमें मानवता की अनुभूति सम्मिलित हो। भारतीय संविधान धर्म, नीति और न्यायकृतीनों के संतुलन का सर्वोच्च उदाहरण है। उन्होंने विद्यार्थियों को संविधान की गरिमा और उसके आदर्शों के संरक्षण का संकल्प लेने का संदेश दिया।
डॉ. संतोष पांडेय ने कहा कि संविधान केवल अधिकारों की गाथा नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व और कर्तव्यों का जीवंत संदेश है। राष्ट्र निर्माण तभी पूर्ण होता है जब प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक और नैतिक दायित्वों का अनुपालन करे। संविधान का मूल उद्देश्य नागरिक में कर्तव्यबोध का विकास करना है। डॉ. विवेक ने कहा कि भारतीय संविधान और राष्ट्र निर्माण एक-दूसरे के पूरक हैं। संविधान नागरिक को विधिक मर्यादा देता है और समाज को विकास की दिशा प्रदान करता है। प्रत्येक नागरिक का जागरूक योगदान ही राष्ट्र की प्रगति का आधार है। डॉ. वंदना गुप्ता ने कहा कि भारतीय संविधान में निहित समानता, गरिमा और न्याय के मूल्य वास्तविक राष्ट्र निर्माण की आधारशिला हैं। संविधान ने विशेष रूप से स्त्री-पुरुष समानता की भावना को प्रतिष्ठित किया है। उन्होंने कहा कि देश तभी विकसित होगा जब संवैधानिक आदर्श सामाजिक व्यवहार में प्रत्यक्ष हों।गोष्ठी की अध्यक्षता विभाग के समन्वयक द्वारा की गई।कार्यक्रम का संचालन प्रो.अजय कुमार सिंह ने किया।अंत में विद्यार्थियों द्वारा प्रश्नोत्तर सत्र के माध्यम से सार्थक संवाद हुआ। कार्यक्रम में दिलीप शुक्ल सहित एलएल.एम. के विद्यार्थी उत्साहपूर्वक उपस्थित रहे।
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