नई दिल्ली,12 दिसंबर (आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम के प्रावधानों से अल्पसंख्यक स्कूलों को छूट देने वाले अपने पिछले फैसले को चुनौती देने वाली एक याचिका पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की. शीर्ष अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत उसके फैसले को चुनौती देने वाली रिट याचिका दायर करना न्यायिक प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग है.
यह मामला न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ के सामने आया. पीठ, ने कहा कि इस तरह के मामले दायर कर न्यायपालिका का स्तर न गिराएं. और याचिकाकर्ता पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया. पीठ ने कहा कि यह दूसरों के लिए एक संदेश होना चाहिए.
पीठ ने कड़े शब्दों में कहा, आप सुप्रीम कोर्ट के साथ ऐसा नहीं कर सकते. हम बहुत नाराज हैं. अगर आप इस तरह के मामले दायर करना शुरू कर देंगे, तो यह देश की पूरी न्यायपालिका प्रणाली के खिलाफ है. पीठ ने आगे कहा, आप अपने मामले की गंभीरता को नहीं जानते. हम खुद को सिर्फ 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाने तक ही सीमित रख रहे हैं.
सुनवाई के दौरान, पीठ ने वकील को फटकार लगाते हुए कहा, इस तरह के मामले दायर करके इस देश में न्यायपालिका का स्तर न गिराएं. यह क्या हो रहा है? क्या वकील इस तरह की सलाह दे रहे हैं? हमें वकीलों पर भी जुर्माना लगाना पड़ेगा.
पीठ ने टिप्पणी की, आप कानून जानने वाले नागरिक हैं, पेशेवर हैं और आप अनुच्छेद 32 के तहत इस अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर करते हैं? यह घोर दुरुपयोग है! हम खुद को रोक रहे हैं. हम अवमानना नोटिस जारी नहीं कर रहे हैं… क्या आप इस देश की न्यायपालिका को ध्वस्त करना चाहते हैं? शीर्ष अदालत ने याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया.
शीर्ष अदालत ने ये कड़ी टिप्पणियां यूनाइटेड वॉयस फॉर एजुकेशन फोरम नामक एक गैर-सरकारी संगठन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कीं. एनजीओ ने निर्देश देने की मांग की थी कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को दी गई छूट असंवैधानिक है, क्योंकि यह उन्हें आरटीई के दायित्वों से पूर्ण प्रतिरक्षा (छूट) देती है.
2014 के फैसले में यह घोषित किया गया था कि आरटीई अधिनियम अनुच्छेद 30(1) के तहत अल्पसंख्यक स्कूलों पर लागू नहीं होता है. यह अनुच्छेद धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन के अधिकारों की रक्षा करता है.
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