नई दिल्ली 13 Dec, (Rns): सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग पर सख्त नाराजगी जताते हुए एक गैर सरकारी संगठन (NGO) पर 1 लाख रुपये का भारी जुर्माना लगाया है। यह मामला अल्पसंख्यक स्कूलों को शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के दायरे से बाहर रखने वाले सुप्रीम कोर्ट के ही पुराने फैसले को चुनौती देने से जुड़ा था। जस्टिस बीवी नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता की इस हरकत को प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग बताया और बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के साथ इस तरह का व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
सुनवाई के दौरान अदालत का माहौल बेहद गरम रहा। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने याचिकाकर्ता और वकीलों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि वे बेहद आक्रोशित हैं। उन्होंने सवाल किया कि आखिर किसी की हिम्मत कैसे हुई कि वह सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के फैसले के खिलाफ ही रिट याचिका दायर कर दे। जजों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस तरह के मामले दायर करना देश की पूरी न्यायपालिका प्रणाली के खिलाफ है और यह न्यायिक व्यवस्था को ध्वस्त करने जैसा है। कोर्ट ने तल्ख लहजे में कहा, “आपको अपने मामले की गंभीरता का अंदाजा नहीं है, इस तरह की याचिकाएं दायर करके देश की न्यायपालिका के स्तर को नीचे न गिराएं।”
जिस एनजीओ पर यह जुर्माना लगाया गया है, उसका नाम ‘यूनाइटेड वॉइस फॉर एजुकेशन फोरम’ है। इस संस्था ने सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के उस 2014 के फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को बाल शिक्षा का अधिकार कानून 2009 के कुछ प्रावधानों से छूट दी गई थी। कोर्ट ने याचिका को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ कोई भी रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं होती, यह कानून की स्थापित प्रक्रिया का उल्लंघन है।
अदालत का गुस्सा यहीं शांत नहीं हुआ। पीठ ने यहां तक कहा कि वे याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक अवमानना का मामला दर्ज करने से परहेज कर रहे हैं, लेकिन भविष्य के लिए यह चेतावनी है। जस्टिस नागरत्ना ने वकीलों को भी आड़े हाथों लेते हुए पूछा कि वे अपने मुवक्किलों को किस तरह की सलाह दे रहे हैं। कोर्ट ने चेतावनी दी कि अब वे गलत कानूनी सलाह देने वाले वकीलों पर भी दंड लगाना शुरू करेंगे। जजों ने कहा कि ऐसी मांगों से पूरी व्यवस्था ठप हो जाएगी और यह कोर्ट का समय बर्बाद करने के साथ-साथ प्रक्रिया का मजाक उड़ाना है।

