इस्लामाबाद ,24 जनवरी । पाकिस्तान के गांवों और कस्बों में चिकित्सा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है और इलाज के नाम पर लोगों की जान के साथ एक खतरनाक खेल चल रहा है। बिना डिग्री, बिना लाइसेंस और बिना किसी निगरानी के हजारों लोग खुद को डॉक्टर बताकर मरीजों का इलाज कर रहे हैं। इस पूरे संकट का सबसे बड़ा खामियाजा गरीब और अशिक्षित परिवारों को भुगतना पड़ रहा है। सही इलाज न मिलने के कारण मौत, स्थायी अपंगता और बाद में बड़े अस्पतालों में होने वाले भारी खर्च जैसी समस्याएं आम हो गई हैं।
सड़क किनारे चल रही हैं मौत की दुकानें
दक्षिणी सिंध प्रांत, विशेषकर हैदराबाद के आसपास के इलाकों में सड़क किनारे छोटे-छोटे क्लिनिक कुकुरमुत्ते की तरह खुले हुए हैं। इन दुकानों में न तो किसी तरह का साइनबोर्ड होता है और न ही डॉक्टरों का कोई पंजीकरण नंबर, फिर भी यहां दिनभर बच्चे, महिलाएं और बुजुर्गों की भीड़ लगी रहती है। जांच में सामने आया है कि इनमें से अधिकांश क्लिनिक ऐसे लोग चला रहे हैं जिन्होंने कभी किसी अस्पताल में केवल सहायक या नर्स के तौर पर काम किया है, लेकिन उनके पास डॉक्टरी पेशे की कोई कानूनी योग्यता या डिग्री नहीं है।
6 लाख फर्जी डॉक्टर और संक्रमण का खतरा
पाकिस्तान मेडिकल एसोसिएशन और सिंध हेल्थकेयर कमीशन के आंकड़ों ने स्थिति की भयावहता को उजागर किया है। अनुमानों के मुताबिक, देशभर में इस समय 6 लाख से अधिक फर्जी डॉक्टर सक्रिय हैं। ये लोग अपने सीमित अनुभव के आधार पर दवाएं देते हैं, बिना यह समझे कि दवाओं के साइड इफेक्ट क्या हो सकते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इन अवैध क्लिनिकों में चिकित्सा उपकरणों को स्टरलाइज नहीं किया जाता और कई जगहों पर सिरिंज का बार-बार इस्तेमाल किया जा रहा है। इस घोर लापरवाही के कारण पाकिस्तान में हेपेटाइटिस और एचआईवी जैसी संक्रामक बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है।
सरकारी अस्पतालों पर बोझ और लाचार कानून
इन ‘झोलाछापÓ डॉक्टरों के गलत इलाज का सीधा असर देश के बड़े सरकारी अस्पतालों पर पड़ रहा है। जब मरीज की हालत बिगड़ जाती है, तो वे अंतिम समय में सरकारी अस्पतालों का रुख करते हैं, जिससे वहां के सीमित संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। दूसरी ओर, स्वास्थ्य नियामक संस्थाएं भी अपनी मजबूरी जाहिर कर रही हैं। संसाधनों की कमी और कमजोर कानूनों के चलते, अगर किसी अवैध क्लिनिक को बंद कराया भी जाता है, तो आरोपी आसानी से जमानत पर छूट जाते हैं और अगले दिन दूसरी जगह दुकान खोल लेते हैं। कई इलाकों में तो निरीक्षण करने वाली टीमों को सुरक्षा खतरों का भी सामना करना पड़ता है।
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