प्रयागराज 3 मार्च (आरएनएस )। होली भारत की सांस्कृतिक आत्मा से जुड़ा ऐसा पर्व है, जो रंगों के माध्यम से जीवन में उल्लास, प्रेम और आपसी सौहार्द घोल देता है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला यह त्योहार केवल परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और मानवीय मूल्यों का उत्सव है। जब गुलाल हवा में उड़ता है, तो भेदभाव, वैमनस्य और कटुता स्वत: ही फीकी पड़ जाती है।होली भारत का एक प्रमुख और रंगों से भरा आनंदमय त्योहार है। यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। होली आपसी प्रेम, भाईचारे और सामाजिक समरसता का संदेश देती है।
होली का संबंध होलिका दहन की पौराणिक कथा से जोड़ा जाता है, जिसमें अहंकार और अन्याय का अंत तथा सत्य और भक्ति की जीत दिखाई देती है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि अंतत: सत्य की ही विजय होती है। साथ ही, होली ऋतु परिवर्तन (शीत से ग्रीष्म की ओर) और नई ऊर्जा के स्वागत का भी पर्व है।
प्रयागराज में होली दो दिन मनाई जाती है। पहले दिन होलिका दहन किया जाता है, जिसमें अग्नि प्रज्वलित कर बुराइयों के त्याग का संकल्प लिया जाता है।दूसरे दिन रंगों की होली खेली जाती है। लोग गुलाल और रंग लगाते हैं, ढोल-नगाड़ों के साथ गीत-संगीत होता है, और एक-दूसरे को मिठाइयां खिलाकर शुभकामनाएं दी जाती हैं।
होली का मूल संदेश बुराई पर अच्छाई की विजय है। होलिका दहन के माध्यम से समाज यह संकल्प लेता है कि अहंकार, अन्याय और नकारात्मकता का अंत होना चाहिए। अग्नि के समक्ष खड़े होकर लोग अपने भीतर की बुराइयों को त्यागने का प्रण करते हैं—यही होली की वास्तविक आत्मा है।
दूसरे दिन रंगों की होली खेली जाती है। बच्चे, युवा और बुज़ुर्ग—सब एक-दूसरे को रंग लगाकर गले मिलते हैं। ढोल-नगाड़ों की थाप, लोकगीतों की मिठास और पारंपरिक व्यंजन—गुझिया, ठंडाई—त्योहार को और भी यादगार बना देते हैं। होली टूटे रिश्तों को जोडऩे और रूठों को मनाने का भी अवसर देती है।
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