सुल्तानपुर 6 मार्च (आरएनएस )। प्रांतीय खंड और लोक निर्माण विभाग खंड-3 की निविदाओं को लेकर दर्जनों ठेकेदार खुलकर सामने आ गए हैं। करीब आधा दर्जन ठेकेदारों ने तकनीकी बिड खुलने के बाद अचानक टेंडर निरस्त किए जाने पर कड़ा आक्रोश जताया है।
ठेकेदारों का आरोप है कि प्रांतीय खंड की 186 और पीडब्ल्यूडी खंड-3 की 146 निविदाएं निरस्त कर दी गईं, जबकि तकनीकी बिड पहले ही खोली जा चुकी थी। सवाल उठ रहा है कि जब प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी थी तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि पूरी निविदा प्रक्रिया ही रद्द करनी पड़ी। इस पूरे मामले में ठेकेदारों ने जिले के कुछ माननीयों पर टेंडर मैनेजमेंट का दबाव बनाने का आरोप लगाया है। ठेकेदारों का कहना है कि जहां प्रतिस्पर्धा ज्यादा दिखी वहां खेल ही खत्म कर दिया गया। वहीं प्रांतीय खंड के अधिशाषी अभियंता अरुण कुमार ने सफाई देते हुए कहा कि रेट सूची में संशोधन को लेकर शासन के निर्देश पर निविदाएं निरस्त की गई हैं। लेकिन सवाल यहीं से शुरू होता है।
जब एक दिन पहले तक अधिकारी कह रहे थे कि टेंडर निरस्त नहीं होंगे तो अचानक शासन का आदेश कहां से टपक पड़ा? क्या शासन के आदेश बिजली की तरह गिरते हैं या फिर किसी के फोन की घंटी के बाद आते हैं?
ठेकेदारों का यह भी कहना है कि पंजीकृत फर्मों ने टेंडर डालने में हजारों रुपये खर्च किए, दस्तावेज तैयार किए, बैंक गारंटी लगाई। अब उसका हिसाब कौन देगा? आक्रोशित ठेकेदारों ने मुख्यमंत्री, पुलिस अधीक्षक और प्रदेश के उच्च अधिकारियों को पत्र भेजकर पूरे मामले की जांच की मांग की है। साथ ही यह आशंका भी जताई है कि फर्जी मुकदमों में फंसाकर उनकी फर्मों को परेशान करने की साजिश हो सकती है। बताया जा रहा है कि पुलिस अधीक्षक चारू निगम ने भी पत्र का संज्ञान लिया है। ठेकेदारों का तंज भी कम तीखा नहीं है। उनका कहना है कि जिनका कोई विधायक गॉडफादर नहीं, उनके लिए टेंडर सिर्फ कागज का सपना है। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या सुल्तानपुर में विकास की सड़कें टेंडर से बनेंगी या फिर सिफारिश की सीढिय़ों से। और अगर हर बार आखिरी समय पर टेंडर ऐसे ही रद्द होते रहे तो फिर ई-टेंडरिंग सिस्टम पारदर्शिता का प्रतीक है या सिर्फ एक नया बहाना?
फिलहाल ठेकेदारों का गुस्सा उबाल पर है और जनता यह देख रही है कि सड़क बनने से पहले ही सिस्टम की सच्चाई सड़क पर आ गई है।
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