नई दिल्ली ,22 मार्च (आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जवल भुइयां ने देश की न्यायपालिका, मुकदमों के बोझ और पुलिस की कार्यप्रणाली पर एक बेहद अहम और तीखी टिप्पणी की है। रविवार को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन नेशनल कॉन्फ्रेंस 2026 को संबोधित करते हुए उन्होंने जमानत न मिलने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता जताई। जस्टिस भुइयां ने कड़े शब्दों में कहा कि आजकल कुछ जज ‘राजा से भी ज्यादा वफादारÓ होने के सिंड्रोम से पीडि़त हो गए हैं। इस मानसिकता के कारण वे सही और जायज मामलों में भी आरोपियों को जमानत नहीं देते हैं, जिसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ता है और उन्हें लंबे समय तक जेल की सलाखों के पीछे रहने को मजबूर होना पड़ता है।
‘विकसित भारत में असहमति कोई अपराध नहींÓ
सम्मेलन में ‘विकसित भारत में न्यायपालिका की भूमिकाÓ विषय पर बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि एक विकसित देश में असहमति और स्वस्थ बहस के लिए पर्याप्त जगह होनी चाहिए। किसी भी विचार से असहमति जताना कोई अपराध नहीं है और समाज में अलग-अलग विचारों के प्रति सहनशीलता बढऩी चाहिए। उन्होंने सामाजिक बुराइयों पर भी तीखा प्रहार करते हुए कहा कि विकसित भारत में यह बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जा सकता कि माता-पिता कहें कि उनके बच्चे दलितों द्वारा बनाया गया खाना नहीं खाएंगे। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि विकसित भारत में ऐसा नहीं हो सकता कि दलित पुरुषों को गलियारों में बिठाया जाए और लोग उन पर पेशाब करें। हर एक व्यक्ति के सम्मान की रक्षा होना बेहद जरूरी है।
मीम्स और सोशल मीडिया पोस्ट्स पर स्नढ्ढक्र से बर्बाद हो रहा समय
अदालतों में पेंडिंग मुकदमों के अंबार पर चिंता जताते हुए उन्होंने इसके पीछे बेतुकी अपीलों और बेबुनियाद एफआईआर (स्नढ्ढक्र) को बड़ी वजह बताया। जस्टिस भुइयां ने कहा कि हाल के दिनों में आपराधिक केस और एफआईआर बहुत ही लापरवाही से दर्ज किए जा रहे हैं। छात्रों के प्रदर्शन, सार्वजनिक आंदोलनों और यहां तक कि सोशल मीडिया पर शेयर किए गए मीम्स या पोस्ट जैसी छोटी-छोटी बातों पर भी तुरंत एफआईआर दर्ज कर ली जाती है। इसके बाद पुलिस की लंबी जांच चलती है और जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है, तो एसआईटी (स्ढ्ढञ्ज) के गठन की मांग की जाती है। इन सब गैर-जरूरी मामलों में न्यायपालिका का बहुत कीमती समय बर्बाद होता है।
्रक्क्र को बताया कठोर कानून, खोले गिरफ्तारी के आंकड़े
अपने संबोधन के दौरान जस्टिस भुइयां ने गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (्रक्क्र) का भी जिक्र किया और इसे एक बेहद कठोर कानून करार दिया। उन्होंने लोकसभा में पेश किए गए गृह मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि साल 2019 में इस कानून के तहत 1984 लोगों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन सिर्फ 34 लोगों को ही दोषी ठहराया जा सका, जो कि मात्र 1.74 फीसदी है। इसी तरह 2020 में 1321 गिरफ्तारियों में से केवल 80 को दोषी साबित किया जा सका। उन्होंने स्पष्ट किया कि लगातार कई सालों से इस कानून के तहत दोषसिद्धि की दर 4 फीसदी से भी कम रही है। जस्टिस भुइयां ने कहा कि ये आंकड़े साफ बताते हैं कि बिना किसी ठोस सबूत के जल्दबाजी में गिरफ्तारियां की जा रही हैं, जिससे निर्दोष लोगों को परेशानी होती है और अदालतों पर भी मुकदमों का भारी बोझ पड़ता है।
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