-डॉ. लोहिया के विचारों की प्रासंगिकताÓ विषय पर हुआ विशेष व्याख्यान
अयोध्या 23 मार्च (आरएनएस)। डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के स्वामी विवेकानंद सभागार में डॉ राममनोहर लोहिया Óजयंती समारोहÓ के अवसर पर विशिष्ट व्याख्यान विषय Óडॉ. लोहिया के विचारों की प्रासंगिकताÓ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जयप्रकाश नारायण विश्वविद्यालय, छपरा, बिहार के पूर्व कुलपति प्रो. हरिकेश सिंह रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति कर्नल डॉ. बिजेंद्र सिंह ने किया। कुलपति ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि डॉ. लोहिया ने समाज में आमूल-चूल परिवर्तन के लिए सात क्रांतियों का आह्वान किया था। उन्होंने शासन के चार स्तंभों की कल्पना की थी जिसमें गाँव, मंडल, प्रांत और केंद्र । डॉ. लोहिया का ग्रामीण विकास का मॉडल Óगाँव की आत्मनिर्भरताÓ और Óमानवीय गरिमाÓ पर टिका था। वे चाहते थे कि आधुनिकता गाँवों तक पहुंचे, लेकिन वह ग्रामीण संस्कृति और रोजगार को नष्ट न करे। लोहिया का संपूर्ण जीवन जीव जल और पर्यावरण की प्रति समर्पित रहा। कुलपति ने यह भी बताया कि आज के ही दिन भारत के तीन महान क्रांतिकारी वीर सपूतों को भी याद किया जाता है, जिन्हें 1931 में लाहौर सेंट्रल जेल में ब्रिटिश सरकार द्वारा फांसी दी गई थी। भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव तीनों वीर सपूतों ने भारत माता की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। उनकी शहादत ने पूरे देश में देशभक्ति की एक नई लहर पैदा कर दी थी, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को और अधिक गति प्रदान की। कार्यक्रम में उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी गई। मुख्य अतिथि प्रो. हरिकेश सिंह ने डॉ. लोहिया के विचारों की प्रासंगिकता पर कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा को जानने के लिए पद से नहीं पदयात्रा से करना चाहिए। उन्होंने कहा कि डॉ लोहिया भारत का झंडा जर्मनी में छात्र-छात्राओं एवं शिक्षाविदों के बीच बुलंद किया। डॉ. लोहिया ने नेल्सन मंडेला से कहीं अधिक रंगभेद की लड़ाई लड़ी। देश की स्वतंत्रता राष्ट्र प्रेम से बनती है। उन्होंने कहा कि लोहिया जी ने रामायण का वास्तविक प्रयोग किया लोहिया जी ने रामायण के तत्वबोध जानने के लिए रामलीला का मंचन आवश्यक बताया इसी कड़ी में वह चित्रकूट में रामलीला के मंचन एवं रामायण मेला की शुरुआत की थी। वर्तमान हम भारत के सभी लोग स्वतंत्रता के मूल्य को भूल रहे हैं। लोहिया का मत था कि भारत में जो भी नाम विदेशी हैं उन्हें बदल दिया जाना चाहिए क्योंकि किसी देश को करने के लिए पहले वहां का ज्ञान मार दिया जाता है। भारत में नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालय इसकी जीती जागती मिशाल है। दुनिया में हिमालय से बड़ा समृद्ध स्थान कोई नहीं है इसीलिए लोहिया ने हिमालय बचाओ का नारा दिया था। प्रो. सिंह ने कहा कि लोहिया का मानना था कि जहां पानी और नमक बचा रहता है, वही राष्ट्र ही बच सकता है। सप्त क्रांति ही परिवर्तन ला सकती है। उनका मत था, कि रमता समता और ममता के सिद्धांत का पालन करना चाहिए और राष्ट्र के प्रति रहे। कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों का स्वागत पुष्प कुछ एवं अंग वस्त्र भेंट कर कार्यक्रम के संयोजक प्रो. आशुतोष सिन्हा ने किया। कार्यक्रम का संचालन अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. नीलम पाठक एवं धन्यवाद ज्ञापन डीन कला संकाय प्रो. मृदुला मिश्रा ने किया। जयंती समारोह के इस अवसर पर अमर बलिदानी सपूतों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित कर छात्राओं द्वारा राष्ट्रगीत की भावपूर्ण प्रस्तुति की गई। इस अवसर पर कुलसचिव विनय कुमार सिंह, प्रो. आर एन राय, प्रो. एस एस मिश्र, प्रो के के वर्मा, प्रो. सी के मिश्र, प्रो. शैलेंद्र कुमार, वर्मा, प्रो. फर्रुख जमाल, प्रो. गंगाराम मिश्र, प्रो. अनूप कुमार, प्रो. सुरेन्द्र मिश्र, प्रो. विनोद कुमार श्रीवास्तव, उपकुलसचिव डॉ रीमा श्रीवास्तव, डॉ. अवध नारायण, डॉ. राजेश कुमार सिंह, ई. विनय कुमार सिंह, के साथ कार्यक्रम में शिक्षक कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
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