कमर्शियल गाडिय़ों का इंश्योरेंस हेतु क्या पता होना चाहिए
प्रयागराज 1 अप्रैल (आरएनएस)। भारत का कमर्शियल गाड़ी सेगमेंट सिर्फ मोबिलिटी से नहीं जुड़ा है, बल्कि यह इकोनॉमी के अलग-अलग सेक्टर को भी आपस में जोड़ता है। आम तौर पर यह समझा जाता है कि मोटर इंश्योरेंस सिर्फ प्राइवेट गाडिय़ों से जुड़ा मसला है, लेकिन ऐसा नहीं है, कमर्शियल गाडिय़ों के लिए भी प्रोटेक्शन उतना ही आवश्यक है। हर साल भारत में लगभग 30 लाख कमर्शियल वाहनों (जिनमें ट्रैक्टर और थ्री-व्हीलर भी शामिल हैं) का उत्पादन और बिक्री होती है। ये वाहन अनगिनत उद्योगों और उनके उत्पादों की आवाजाही को लगातार बनाए रखते हैं और अर्थव्यवस्था की रफ्तार को थामे रखते हैं। फिर भी, देश की अर्थव्यवस्था के लिए इतना अहम यह क्षेत्र, देश में व्याप्त बीमा की कमी (अंडरइंश्योरेंस) की समस्या से अछूता नहीं है।
पालिसी बाजार. काम के मोटर इंश्योरेंस- हेड पारस पसरिचा ने कहा: मोटर इंश्योरेंस एक कानूनी जरूरत है, लेकिन कमर्शियल सेगमेंट में अंडर इंश्योरेंस अक्सर बहुत कम थर्ड-पार्टी कवर, कम इंश्योर्ड डिक्लेयर्ड वैल्यू, या जरूरी ऐड-ऑन की कमी के रूप में होता है।
सरकार और इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, माल ढुलाई ही भारत की जीडीपी का लगभग 14त्न है, जिसमें सड़क परिवहन देश के माल की मात्रा का 65त्न से ज्यादा हिस्सा ढोता है। एक ऐसे सेगमेंट के लिए जो कम मार्जिन और ज्यादा इस्तेमाल पर काम करता है, रिस्क और प्रोटेक्शन के बीच यह अंतर वल्नरेबिलिटी का एक बड़ा कारण बनता है।
कमर्शियल गाडिय़ां अत्यावश्यक कैटेगरी में आती हैं। यहां हम बता रहे हैं कि उनका सही तरीके से इंश्योरेंस कैसे किया जा सकता है।
कमर्शियल गाडिय़ों अपनी बनावट और कामकाज के कारण अधिक रिस्क उठाते हैं। ये वाहन लंबी दूरी तय करते हैं, सालाना ज्यादा माइलेज देती हैं, कम डिलीवरी टाइमलाइन में चलती हैं।
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