निजी रंजिश में रची गई कब्र की साजिश हुई नाकाम, अब साजिशकर्ता की साख दफन
प्रयागराज,18 अपै्रल (आरएनएस)। कहते हैं कि राजनीति में आने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आप रातों-रात समाजसेवी से सिपाही बन जाते हैं। लखनऊ के राजाजीपुरम में भी इन दिनों एक ऐसी ही फर्जी सर्जिकल स्ट्राइक की चर्चा है, जहाँ एक स्वयंभू भाजपा सिपाही ने सरकारी तंत्र के कंधे पर बंदूक रखकर निशाना तो साधा, लेकिन गोली उन्हीं के पैर पर जा लगी।
मामला राज गार्डन का है। संचालक आरिफुल हसन ने जब प्रेस वार्ता की, तो परतें प्याज की तरह नहीं, बल्कि किसी थ्रिलर फिल्म की तरह खुलीं। खुद को भाजपा का नुमाइंदा बताने वाले जीशान खान ने सोचा होगा कि एलडीए में एक शिकायत डाल दो कि गार्डन कब्रिस्तान पर बना है, और बस. उगाही का रास्ता साफ! लेकिन बेचारे भूल गए कि झूठ के पैर नहीं होते, और सरकारी कागजों में मुर्दे नहीं बोला करते। आरिफुल हसन ने साफ कह दिया कि भाई साहब, जिस जमीन पर आप मुर्दे ढूंढ रहे हैं, वहाँ तो कानूनी तौर पर ईंटें लगी हैं। असल में ये सारा खेल मुर्दों की फिक्र का नहीं, बल्कि जिंदा नोटों की भूख और पुराने उधार से बचने की एक नाकाम कोशिश थी।
हैरानी की बात तो यह है कि नियम-कायदों को ताक पर रखकर वक्फ बोर्ड ने इन्हें मुतवल्ली की पदवी से भी नवाज दिया। अब सवाल यह उठता है कि क्या मुतवल्ली बनाने की योग्यता अब गंभीर धाराओं वाले मुकदमे हो गई है? हसनगंज और बाजार खाला थानों के रिकॉर्ड तो नेताजी की कुंडली में चार चांद लगा रहे हैं, फिर भी नियम शायद कहीं कोने में दुबक कर रो रहे होंगे।
मसाला तब और बढ़ गया जब पंकज गौतम नाम के शख्स ने कहानी में एंट्री मारी। आरोप है कि नेताजी ने व्यवसाय दिलाने का झांसा देकर न सिर्फ कागजों पर दस्तखत कराए, बल्कि पंकज की स्कूटी तक दबा ली। अब सोचिए, जो खुद को पार्टी का प्रदेश सचिव बताए और एक अदद स्कूटी के लिए कोर्ट के चक्कर लगवाए, उसकी प्रोफेशनल ब्लैकमेलिंग का स्तर क्या ही होगा!
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