-सतत पर्यावरण प्रबंधन: भारतीय ज्ञान प्रणालियों, नीतिगत ढांचे और तकनीकी नवाचारों का एकीकरण पर बारह दिवसीय ऑनलाइन एफडीपी का शुभारंभ
अयोध्या 26 अप्रैल (आरएनएस)। डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (आइक्यूएसी) द्वारा सतत पर्यावरण प्रबंधन: भारतीय ज्ञान प्रणालियों, नीतिगत ढांचे और तकनीकी नवाचारों का एकीकरण विषय परएफडीपी बारह दिवसीय संकाय विकास कार्यक्रम का उद्घाटन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति कर्नल डॉ. बिजेंद्र सिंह ने किया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के के रूप में नई दिल्ली से प्रख्यात पर्यावरणविद संजय स्वामी ने प्रतिभाग किया। अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति डॉ. बिजेंद्र सिंह ने राजस्थान के बाड़मेर जिले के अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि कैसे विषम परिस्थितियों और संसाधनों की कमी के बावजूद वहां के लोग प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर रहते हैं। राजस्थान में जल संरक्षण केवल इंजीनियरिंग नहीं बल्कि हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है। किलों के भीतर जल प्रबंधन की ऐसी व्यवस्था थी कि घेराबंदी के दौरान भी वर्षों तक पानी की कमी नहीं होती थी। आधुनिक जल संकट के दौर में राजस्थान की ये प्राचीन विधियाँ सबसे अधिक Óसस्टेनेबलÓ (स्थायी) समाधान मानी जाती हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा में हमने प्रकृति का दोहन नहीं, बल्कि पोषण सीख विद्यमान है। हमारी संस्कृति का हर तत्व जैव-विविधता के संरक्षण से जुड़ा है। जब हम जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के दौर में हैं, तब हमें ऐसी तकनीकों की जरूरत है जो कार्बन फुटप्रिंट को कम करें। अपशिष्ट प्रबंधन को सुगम बनाएं। यह एफडीपी प्राचीन बोध और नवीन शोध हमारी जड़ों और हमारे पंखों का संगम होगा। मुख्य वक्ता प्रख्यात पर्यावरणविद संजय स्वामी ने जल संरक्षण पर विशेष जोर देते हुए कहा कि वॉटर ऑडिट के तहत शैक्षणिक संस्थानों में जल के उपयोग का ऑडिट होना अनिवार्य है ताकि बर्बादी को रोका जा सके। उन्होंने नदी संरक्षण के तहत नदियों में फूल या अन्य सामग्री प्रवाहित न करने की अपील की। उन्होंने तरल साबुन और साधारण साबुन के बीच जल की खपत के अंतर को समझाते हुए बताया कि कैसे छोटी-छोटी आदतें पानी की बड़ी बचत कर सकती हैं।
तकनीकी सत्र के मुख्य वक्ता भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के विज्ञान संचारक एवं वैज्ञानिक डॉ. निमिष कपूर ने वर्तमान समाज पर कटाक्ष करते हुए कहा, पृथ्वी को बचाने की हमारी जिम्मेदारी बढ़ रही है, लेकिन हम उतने ही गैर-जिम्मेदार होते जा रहे हैं।”उन्होंने व्यक्तिगत उपयोग के लिए पॉली बैग्स के बढ़ते चलन पर चिंता व्यक्त की। पश्चिमी संस्कृति और भारतीय संस्कृति के बीच Óनागरिक बोधÓ की तुलना करते हुए उन्होंने Óप्रकृति की तरफ लौटनेÓ का आह्वान किया। डॉ. कपूर ने शोधकर्ताओं से अपील की कि उनके शोध पत्र केवल पत्रिकाओं तक सीमित न रहें, बल्कि समाचार पत्रों के माध्यम से समाज तक पहुँचें ताकि आम जन जागरूक हो सके।
संवादात्मक सत्र में प्रतिभागियों की जिज्ञासा कार्यक्रम के अंत में प्रश्नोत्तर सत्र का आयोजन हुआ, जिसमें प्रतिभागियों ने प्रबंधन संकाय की भूमिका और व्यक्तिगत स्तर पर निरंतरता में योगदान देने जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि पर्यावरण केवल विज्ञान का विषय नहीं है, बल्कि यह प्रबंधन और व्यक्तिगत व्यवहार का हिस्सा है। कार्यक्रम शुभारंभ डॉ. कीर्ति विक्रम सिंह के प्रारंभिक उद्बोधन से हुई, उन्होंने पर्यावरण प्रबंधन के वर्तमान परिदृश्य और इस प्रशिक्षण कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की। विश्वविद्यालय आइक्यूएसी के निदेशक प्रो. हिमांशु शेखर सिंह ने मुख्य अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि शैक्षणिक संस्थानों की यह जिम्मेदारी है कि वे पर्यावरण और समाज के बीच सेतु का कार्य करें। इस कार्यशाला में विश्वविद्यालय के शिक्षकों के साथ देशभर से बड़ी संख्या में शिक्षकों एवं शोध छात्रों ने ऑनलाइन हिस्सा लिया। तकनीकी सत्र का संचालन डॉ. राकेश कुमार ने किया।
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