रायपुर, 02 मई (आरएनएस)। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (ढ्ढत्र्यङ्क) में नियुक्तियों और पदोन्नतियों को लेकर गंभीर अनियमितताओं का मामला सामने आया है। आरोप है कि विश्वविद्यालय में नियमों की अनदेखी करते हुए अस्थायी और प्रोजेक्ट आधारित कर्मचारियों को सीधे उच्च शैक्षणिक और प्रशासनिक पदों पर पदस्थ कर दिया गया, जिससे संस्थान पर हर वर्ष लगभग 50 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ रहा है।
मामला कृषि विज्ञान केंद्र (्यङ्क्य) से जुड़े कर्मचारियों का बताया जा रहा है, जहां ट्रेनिंग एसोसिएट और जूनियर वैज्ञानिक जैसे अस्थायी पदों पर नियुक्त लोगों को प्रोफेसर, डीन और यहां तक कि कुलपति स्तर के महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचा दिया गया। दस्तावेजों के अनुसार, इन कर्मचारियों की मूल नियुक्ति अस्थायी प्रकृति की थी, जो न तो विश्वविद्यालय के नियमित संवर्ग का हिस्सा हैं और न ही राज्य शासन के अधीन आते हैं। इसके बावजूद उन्हें बिना स्पष्ट प्रशासनिक स्वीकृति के उच्च जिम्मेदारियां सौंप दी गईं।
इसी कड़ी में विवेक त्रिपाठी का मामला भी सामने आया है, जिनकी नियुक्ति वर्ष 1994 में तकनीकी अधिकारी के रूप में हुई थी, लेकिन वर्तमान में वे अनुसंधान संचालक के पद पर कार्यरत हैं। नियमों के मुताबिक तकनीकी अधिकारी को शैक्षणिक पदों पर पदोन्नत नहीं किया जा सकता, इसके बावजूद उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई है।
वहीं, डॉ. रतना नशीने, जो ्यङ्क्य के अंतर्गत जूनियर वैज्ञानिक के रूप में नियुक्त हुई थीं, वर्तमान में नारायणपुर कृषि महाविद्यालय की डीन के पद पर कार्यरत हैं। उल्लेखनीय है कि उनका विषय होम साइंस है, जबकि यह विषय विश्वविद्यालय में संचालित नहीं है, जिससे इस नियुक्ति पर भी सवाल उठ रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, इस तरह के 100 से अधिक मामलों की जानकारी सामने आई है, जिनमें कर्मचारियों को नियमों को दरकिनार कर उच्च पदों पर समायोजित किया गया है। इससे न केवल वित्तीय अनियमितताओं में वृद्धि हुई है, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता और विद्यार्थियों के भविष्य पर भी असर पडऩे की आशंका जताई जा रही है।
नियमों के अनुसार, ्यङ्क्य के कर्मचारी प्रोजेक्ट आधारित होते हैं और उनकी सेवा संबंधित परियोजना तक सीमित रहती है। उन्हें न तो भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ढ्ढष्ट्रक्र) के नियमित कर्मचारियों के समान माना जा सकता है और न ही राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के स्थायी शिक्षकों के समकक्ष। ऐसे में उन्हें प्रोफेसर या अन्य शैक्षणिक पदों पर नियुक्त करना नियमों के विपरीत माना जा रहा है।
मामले की शिकायत के बाद मंत्री स्तर पर भी संज्ञान लिया गया है और कुछ अधिकारियों को हटाने के लिए पत्राचार किया गया, लेकिन अब तक न तो किसी ठोस जांच की शुरुआत हुई है और न ही किसी जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई की गई है। प्रदेश के कृषि मंत्री राम विचार नेताम ने कहा है कि मामला उनके संज्ञान में है और आवश्यक जानकारी लेने के बाद नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
वहीं, विश्वविद्यालय के कुलपति गिरिश चंदेल ने कहा कि यह मामला पुराना है और बिना फाइल देखे कोई टिप्पणी करना उचित नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय में सभी प्रक्रियाएं नियमों और कानून के तहत ही की जा रही हैं।
आरोपों में घिरे अधिकारियों ने भी अपने-अपने पक्ष रखे हैं। डॉ. राजेंद्र लाखपाले से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन खबर लिखे जाने तक उनका पक्ष सामने नहीं आ सका। विवेक त्रिपाठी ने अपने बचाव में कहा कि उनकी नियुक्ति और पदोन्नति नियमों के अनुसार हुई है और यदि कोई गड़बड़ी होती तो प्रमोशन संभव नहीं होता। वहीं, डॉ. रतना नशीने ने इस संबंध में टिप्पणी करते हुए कहा कि उनकी नियुक्ति की वैधता पर सवाल नियुक्ति करने वाले अधिकारियों से पूछे जाने चाहिए।
पूरे मामले ने कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या बिना अनुमति अस्थायी कर्मचारियों को उच्च पदों पर बैठाया जा सकता है? क्या वेतन आयोग के नियमों का उल्लंघन कर अतिरिक्त भुगतान किया गया? और सबसे अहम, इस स्थिति के लिए जवाबदेही किसकी तय होगी?
छत्तीसगढ़ की कृषि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े इस प्रकरण ने विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। अब यह देखना बाकी है कि मामले की निष्पक्ष जांच होती है या यह मुद्दा भी अन्य मामलों की तरह फाइलों तक सीमित रह जाता है।
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