केप वर्डे,05 मई। अटलांटिक महासागर में एक पर्यटक जहाज पर हंता वायरस फैल गया है। इसके चलते 3 लोगों की मौत हो गई है और कम से कम 3 अन्य लोग बीमार हो गए हैं। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि जहाज पर सवार 170 यात्री बीच समुद्र में ही फंस गए हैं। उन्हें जहाज से नीचे उतरने की भी अनुमति नहीं है। फिलहाल ये जहाज केप वर्डे के तट पर लंगर डाले खड़ा है। आइए हंता वायरस के बारे में जानते हैं।
अमेरिका के सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल (सीडीसी) के मुताबिक, हंता वायरस वायरसों का एक समूह है, जो मुख्य रूप से चीजों को कुतरने वाले जीवों (रोडेंट्स) में पाया जाता है। ये चूहे, गिलहरी और छछूंदर में भारी संख्या में होते हैं। अब तक इसके कम से कम 38 अलग-अलग प्रजातियों का पता है, जिनमें से 24 मनुष्यों में बीमारियां फैलाती हैं। वायरस के वाहक चूहे के यूरिन, मल और लार के संपर्क में आने पर इंसान संक्रमित हो जाते हैं।
हंता वायरस की 2 प्रमुख वंशावलियां हैं: न्यू वर्ल्ड हंता वायरस और ओल्ड वर्ल्ड हंता वायरस। यूरोप और एशिया में पाए जाने वाले हंता वायरस ओल्ड वर्ल्ड के हैं। इनमें पुमाला और सियोल वायरस शामिल हैं। ये आमतौर पर गुर्दे की समस्याओं के साथ बुखार का कारण बनते हैं। वहीं, न्यू वर्ल्ड हंता वायरस अमेरिका में पाए जाते हैं और आमतौर पर पल्मोनरी सिंड्रोम का कारण बनते हैं। ये फेफड़ों के सिंड्रोम और सांस संबंधी बीमारी पैदा करते हैं।
हंता वायरस आमतौर पर रोडेंट्स के मल, मूत्र और लार के सांस लेने या संपर्क में आने से मनुष्यों में फैलता है। बहुत दुर्लभ मामलों में ये संक्रमित जानवरों के काटने और खरोंच के जरिए भी फैल सकता है। इसके अलावा इंसान अगर ऐसी चीज खा ले, जिस पर चूहे का मल-मूत्र या लार मौजूद हो तो भी संक्रमित होने का खतरा रहता है। हालांकि, यह आसानी से एक इंसान से दूसरे इंसान में नहीं फैलता।
हंता वायरस से संक्रमित लोगों में तेज बुखार, सिर दर्द, बदन दर्द, पेट में दर्द, उल्टी, डायरिया जैसे लक्षण देखे गए हैं। ज्यादा गंभीर संक्रमण होने पर सांस लेने में तकलीफ होने लगती है और फेफड़ों में पानी भरने लगता है। सीडीसी के मुताबिक, हंता के संक्रमण का पता लगने में एक से 8 हफ्तों का वक्त लग सकता है। 4 से 10 दिन के अंदर संक्रमण की गंभीरता बढ़ती है।
सीडीसी के मुताबिक, वायरस की मृत्युदर 38 प्रतिशत है। इस वायरस का फिलहाल कोई सटीक इलाज या वैक्सीन नहीं है, केवल लक्षणों के आधार पर उपचार किया जाता है। चूंकि, इसके लक्षण अन्य बीमारियों जैसे ही हैं, इसलिए शुरुआत में ही सटीक इलाज मुश्किल होता है। मलेशिया के मोनाश विश्वविद्यालय में प्रोफेसर विनोद बालासुब्रमण्यम ने कहा, अभी तक कोई एंटीवायरल दवा नहीं है जो वाकई कारगर हो। इलाज आमतौर पर सहायक उपचारों से किया जाता है।
इस जहाज का नाम एमवी होंडियस है, जो अर्जेंटीना के उशुआया से रवाना हुआ था और अंटार्कटिका व सेंट हेलेना होते हुए केप वर्डे पहुंचा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, जहाज पर एक डच दंपति सबसे पहले संक्रमित हुए। जिसके बाद 70 वर्षीय यात्री की मौत हो गई। उनका शव सेंट हेलेना में उतारा गया। वहीं, उनकी पत्नी घर लौटने के दौरान दक्षिण अफ्रीका के एक हवाई अड्डे पर अचानक गिर पड़ीं और अस्पताल में उनकी मौत हो गई।
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