नई दिल्ली, 11 मई (आरएनएस)। भारत का स्मार्ट सिटीज मिशन मार्च 2025 में एक दशक पूरा करने के बाद समाप्त हुआ। इस दौरान देश के 100 शहरों में 8,000 से अधिक परियोजनाओं पर ₹1.6 लाख करोड़ खर्च किए गए। यह एक अहम शुरुआत जरूर थी, लेकिन आगे की चुनौती कहीं बड़ी है। वर्ष 2030 तक करीब 60 करोड़ भारतीय शहरों में रहेंगे, जबकि उसके बाद के दो दशकों में लगभग 40 करोड़ और लोगों के शहरी क्षेत्रों में जुड़ने का अनुमान है। अप्रैल 2026 में अधिसूचित अर्बन चैलेंज फंड ने भी साफ संकेत दिया है कि अब नीतिगत फोकस टियर-2 और टियर-3 शहरों पर होना चाहिए, साथ ही ऐसी परियोजनाओं पर जो आर्थिक रूप से खुद को टिकाए रख सकें। इस स्तर की चुनौती का बोझ केंद्र सरकार अकेले नहीं उठा सकती। यही वजह है कि नीति निर्माता अब सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित और संचालित करने के नए मॉडल तलाश रहे हैं। ऐसा ही एक मॉडल वर्चुअल डिजिटल एसेट्स की दुनिया में उभर रहा है। इसे DePIN यानी डिसेंट्रलाइज्ड फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क्स कहा जाता है। इस अवधारणा को समझने का सबसे आसान तरीका इसके शुरुआती और चर्चित उदाहरणों में से एक — फाइलकॉइन — को देखना है। भारत ने UPI के जरिए भुगतान प्रणाली और आधार के जरिए पहचान व्यवस्था को नए सिरे से परिभाषित किया। ऐसे में अगले 500 शहरों की मॉनिटरिंग और मीटरिंग व्यवस्था को नए तरीके से तैयार करना अगला तार्किक कदम हो सकता है। सही नियामकीय ढांचे के साथ क्रिप्टो सेक्टर इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। DePIN सरकार की जगह नहीं लेगा, लेकिन आने वाले शहरों के लिए यह ऐसा टूल साबित हो सकता है, जो इस पूरी चुनौती को आसान बनाने में मदद करे।
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