मूल गर्भगृह स्थल पर पूजा के अधिकार की जाएगी मांग
प्रयागराज 15 मई (आरएनएस)। श्री कृष्ण जन्मभूमि बनाम शाही ईदगाह मस्जिद केस के हिन्दू पक्षकार महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट ने धार भोजशाला मामले में आए इंदौर हाईकोर्ट के फैसले को श्रीकृष्ण जन्मभूमि शाही ईदगाह प्रकरण के लिए “बड़ी कानूनी और ऐतिहासिक नजीर” बताया है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार अदालत ने भोजशाला मामले में पुरातात्विक साक्ष्यों, प्राचीन परंपराओं और पूजा की निरंतरता को महत्व दिया है, उसी प्रकार मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले में भी ऐतिहासिक तथ्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष एवं हिंदू पक्षकार महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट ने कहा कि अयोध्या राम मंदिर और भोजशाला दोनों मामलों के फैसलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि न्यायालय अब ऐतिहासिक दस्तावेजों, एएसआई रिपोर्ट और धार्मिक परंपराओं को गंभीरता से देख रहा है। उनका कहना है कि मथुरा में भी मूल गर्भगृह स्थल पर हिंदुओं को पूजा का अधिकार मिलना चाहिए। वह न्यायालय में इसकी मांग करेंगे।
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“एलेक्जेंडर कनिंघम की रिपोर्ट में भी मंदिर का उल्लेख”
प्रयागराज। श्री कृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास अध्यक्ष के महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट ने कहा है कि भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रथम डायरेक्टर अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा 1862 से 1865 के बीच तैयार किए गए अभिलेखों और पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि जहां वर्तमान में शाही ईदगाह स्थित है, वहां पहले भगवान श्रीकृष्ण का मंदिर था। उन्होंने कहा कि एएसआई भी पहले यह स्पष्ट कर चुका है कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि के निकट स्थित मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष मौजूद हैं।
उन्होंने कहा कि भोजशाला फैसले में इंदौर हाईकोर्ट ने पूजा अधिनियम 1991 को लागू नहीं माना, जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट भी इस अधिनियम को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कर चुका है। ऐसे में मथुरा केस में भी यह मुद्दा निर्णायक साबित हो सकता है।
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