नई दिल्ली ,21 मई (आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि राजद्रोह से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए के तहत मुकदमे की सुनवाई अदालतें कर सकती हैं, बशर्ते आरोपी को कोई आपत्ति न हो. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने राजद्रोह से संबंधित एक मामले में 17 साल से जेल में बंद एक आरोपी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह स्पष्टीकरण दिया.
न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली भी इस पीठ का हिस्सा थे. पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता की शिकायत यह है कि धारा 124ए के तहत आरोप सहित उसकी आपराधिक अपील की पूरी सुनवाई पर उसे कोई आपत्ति नहीं है.
पीठ ने कहा, इसलिए हम स्पष्ट करते हैं कि जहां भी आरोपी को मुकदमे, अपील या किसी अन्य कार्यवाही की कार्यवाही पर कोई आपत्ति नहीं है, जिसमें उस पर धारा 124ए आईपीसी के तहत भी आरोप पत्र दायर किया गया है, वहां अदालतों को ऐसे मामलों का गुण-दोष और कानून के अनुसार निर्णय लेने में कोई बाधा नहीं होगी.
अभियुक्त द्वारा दायर अपील मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में लंबित है. सर्वोच्च न्यायालय ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय को याचिकाकर्ता की अपील पर सुनवाई करने और योग्यता के आधार पर निर्णय लेने का निर्देश दिया.
मई 2022 में, सर्वोच्च न्यायालय ने राजद्रोह से संबंधित दंड प्रावधान को तब तक के लिए स्थगित कर दिया जब तक कि केंद्र सरकार औपनिवेशिक काल के इस कानून की समीक्षा पूरी नहीं कर लेती. सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को राजद्रोह से संबंधित कोई भी नया मामला दर्ज न करने का निर्देश दिया.
सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि राजद्रोह कानून के तहत चल रही जांच, लंबित मुकदमे और सभी कार्यवाही पूरे देश में स्थगित रखी जाएंगी और राजद्रोह के आरोप में जेल में बंद लोग जमानत के लिए न्यायालय में अपील कर सकते हैं.
1890 में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 124ए में शामिल राजद्रोह के अपराध पर असहमति की अभिव्यक्ति, यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी, के खिलाफ एक हथियार के रूप में इसके उपयोग के कारण गहन जन जांच चल रही है.
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