नई दिल्ली,21 मई (आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस बात पर जोर दिया कि न्याय प्रणाली को आरोपियों की सुविधा से ज्यादा पीडि़तों को प्राथमिकता देनी चाहिए. अदालत ने सुनवाई के दौरान 49 करोड़ रुपये के फ्रॉड केस में कई एफआईआर को एक साथ करने से मना कर दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वित्तीय अपराध के पीडि़त अक्सर न्यायिक प्रक्रिया में अदृश्य होते हैं. अदालत ने सवाल किया कि क्या उन्हें सिर्फ आरोपियों को फायदा पहुंचाने के लिए अलग-अलग राज्यों में यात्रा करने के लिए मजबूर करना सही होगा.
इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और विपुल एम पंचोली की बेंच ने की. बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि पीडि़तों पर ध्यान देने वाला नजरिया जरूरी है, साथ ही निवेशकों से 49 करोड़ रुपये की कथित ठगी के सिलसिले में सात राज्यों में लंबित 53 एफआईआर को एक साथ करने की अर्जी को खारिज कर दिया. सीनियर वकील अमन लेखी ने बेंच के सामने आरोपी उपेंद्र नाथ मिश्रा और काली प्रसाद मिश्रा की तरफ से पैरवी की.
सुनवाई के दौरान, बेंच ने आरोपी के वकील को साफ कर दिया कि वह अर्जी पर विचार करने को तैयार नहीं है. बेंच ने आपराधिक कानून (क्रिमिनल लॉ) में हाल के बदलावों का जिक्र किया और कहा कि अब पीडि़तों के अधिकारों को माना गया है. आरोपियों के खिलाफ ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा और आंध्र प्रदेश में कई आपराधिक मामले लंबित हैं.
सुनवाई के दौरान बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसलों का जिक्र किया, जिसमें बड़े फ्रॉड केस में एफआईआर को एक साथ करने का आदेश दिया गया था. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि पीडि़त-केंद्रित न्यायिक नजरिए के बजाय, एफआईआर को एक साथ करने और तेजी से ट्रायल के नाम पर आरोपियों के पक्ष में फैसले दिए जा रहे थे.
बेंच ने कहा कि वह एफआईआर को एक साथ करने का आदेश देने के पक्ष में नहीं है. बेंच ने वकील से पूछा कि, ऐसे अपराधों के पीडि़तों के अधिकारों का क्या होगा. बेंच ने कहा कि हर फ्रॉड केस अलग और भिन्न होता है क्योंकि पीडि़त और ठगी गई रकम अलग-अलग होती है. बेंच ने आगे कहा कि, बेशक, आरोपी वही रहता है और इस बात पर जोर दिया कि वह जांच के मकसद से एफआईआर को एक साथ नहीं कर सकती.
सुप्रीम कोर्ट के चीफ (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि, फ्रॉड के ऐसे पीडि़त न्यायिक सिस्टम के भी अदृश्य शिकार हैं, जिसने उनके बारे में नहीं सोचा. एक उदाहरण देते हुए, सीजेआई ने पूछा कि क्या ओडिशा में एक पीडि़त, जिससे 10,000 रुपये की ठगी हुई थी, को एफआईआर को एक साथ करने के बाद केस के सिलसिले में दूसरे शहर जाने के लिए कहना सही होगा.
सीजेआई ने कहा, क्या यह सही है कि आप अपने अपराध के पीडि़तों से कहें कि वे आरोपी की सुविधा के हिसाब से अलग-अलग जगहों से एक जगह आएं. बेंच ने मौखिक रूप से कहा कि धोखाधड़ी, चीटिंग और साजिश का हर अपराध अलग-अलग होता है. जस्टिस बागची ने पूछा कि ऐसे अपराधों के पीडि़तों को क्यों तकलीफ उठानी चाहिए.
लेखी को जब लगा कि बेंच इस मामले पर सुनवाई करने के लिए तैयार नहीं है, तो उन्होंने याचिका वापस लेने की इजाजत मांगी. बेंच ने उनकी आग्ह को मान लिया, जिससे याचिका वापस ले ली गई.
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