कोलकाता 25 मई (आरएनएस)। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम आते ही चुनावी रणनीतिकार संस्था आई-पैक कोलकाता से अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया है। साल्टलेक स्थित मुख्यालय को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया है। वहीं, आई-पैक की विदाई के बीच टीएमसी की वरिष्ठ सांसद काकली घोष दस्तीदार ने इस्तीफा देकर पार्टी के भीतर ‘मशीनी राजनीतिÓ के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया है।
चुनाव संपन्न होते ही और बंगाल में भाजपा सरकार के बनते ही आई-पैक ने कोलकाता के साल्टलेक स्थित अपने आलीशान दफ्तर पर हमेशा के लिए ताला लटका दिया है। तिलोत्तमा (कोलकाता) की धरती से कॉर्पोरेट पॉलिटिक्स का यह दौर बेहद कड़वाहट के साथ खत्म हुआ है।
सूत्रों के मुताबिक, चुनाव के बीच में ही अचानक दफ्तर बंद कर कर्मचारियों को ‘वर्क फ्रॉम होमÓ दिया गया था, जो कभी दोबारा नहीं खुला। अब दफ्तर बंद होने के साथ ही कोलकाता के अधिकांश स्थानीय कर्मचारियों को छंटनी का नोटिस थमा दिया गया है, जबकि बचे हुए कुछ चुनिंदा कर्मियों को दक्षिण भारत ट्रांसफर किया जा रहा है। आई-पैक के बोरिया-बिस्तर समेटने के बीच ही तृणमूल कांग्रेस के भीतर का असंतोष और गुस्सा बारूद की तरह फट पड़ा है। टीएमसी की वरिष्ठ सांसद काकली घोष दस्तीदार ने राज्य अध्यक्ष सुब्रत बख्शी को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। हालांकि, पत्र में उन्होंने हार की ‘नैतिक जिम्मेदारीÓ लेने की बात कही है, लेकिन उनका असली निशाना पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी और आई-पैक पर ही था। अपने पत्र में अभूतपूर्व हमला करते हुए काकली ने साफ लिखा: “ऐसी भुईंफोड़ (रातों-रात खड़ी हुई कॉर्पोरेट) संस्थाओं के भरोसे कोई कठिन या बड़ा काम नहीं किया जा सकता।” साल 2019 के लोकसभा चुनाव में जब बंगाल में भाजपा ने बड़ी बढ़त बनाई थी, तब अभिषेक बनर्जी ने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर और उनकी संस्था आई-पैक को जिम्मेदारी सौंपी थी। 2021 के विधानसभा चुनाव में जीत के बाद ममता बनर्जी भी इस संस्था के प्रभाव में आ गईं और आई-पैक टीएमसी के भीतर एक ‘थर्ड पावर सेंटरÓ बन गया। प्रशांत किशोर के बाद प्रतीक जैन इस संस्था को संभाल रहे थे। स्थिति यह थी कि आई-पैक के युवा और नौसिखिए लड़के-लड़कियां जिला अध्यक्षों और राज्य के कद्दावर मंत्रियों तक को चमकाने और दिशा-निर्देश देने लगे थे।
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