नई दिल्ली,26 मई(आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें मुंबई के पारसी जोरास्ट्रियन पुरवेज बुर्जोर दलाल की संपत्ति से जुड़े पक्षों के व्यवहार की कोर्ट की निगरानी में आपराधिक जांच का निर्देश दिया गया था. दलाल का 2011 में निधन हो गया था.
जस्टिस पंकज मिथल और प्रसन्ना बी वराले की बेंच ने क्या कहा
अपील में कोई दम नहीं होने के कारण उन्हें खारिज किया जाना चाहिए और इसलिए उन्हें खारिज किया जाता है. चूंकि हम हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रख रहे हैं, इसलिए हम यहां यह कह सकते हैं कि अगर हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, प्रोथोनोटरी (प्रधान क्लर्क या मुख्य अभिलेख अधिकारी) द्वारा एक रिपोर्ट तैयार की जाती है और जांच के लिए जमा की जाती है, तो सक्षम जांच अधिकारी तेजी से जांच करे और हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार प्रगति रिपोर्ट जमा करे.
बेंच ने कहा कि अपील करने वालों और उनसे जुड़ी संस्थाओं के व्यवहार से पता चलता है कि प्रशासक के काम को नाकाम करने और स्वर्गीय पुरवेज बुर्जोर दलाल की संपत्ति को हड़पने की एक सोची-समझी, धोखेबाज कोशिश की गई.
बेंच ने कहा कि हाई कोर्ट का इस खुलेआम प्रक्रिया के गलत इस्तेमाल पर चुप रहने से इनकार करना पूरी तरह से सही था. बेंच ने कहा कि कोर्ट की निगरानी में जांच का निर्देश देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 215 का इस्तेमाल करना न केवल कानूनी तौर पर सही था, बल्कि संपत्ति को बीच में बचाने और कानून की गरिमा बनाए रखने के लिए बिल्कुल जरूरी था.
बेंच ने कहा कि उसे हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा 16 जुलाई, 2024 को दिए गए विवादित कॉमन फाइनल जजमेंट और आदेश में, और न ही 21 दिसंबर, 2018 के सिंगल जज के मूल आदेश में कोई कमी या गैर-कानूनीपन नहीं मिला. मृतक बैचलर (अविवाहित) था और अपने पीछे काफी चल और अचल संपत्ति छोड़ गया, जिसकी कीमत लगभग 100 करोड़ रुपये से ज्यादा आंकी गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने बाई अवबाई होर्मुसजी टाटा ट्रस्ट और अन्य की अपील खारिज कर दी, जो उन्होंने 16 जुलाई, 2024 के डिवीजन बेंच के आदेश के खिलाफ दायर की थी. डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के आदेश के खिलाफ उनकी याचिका खारिज कर दी थी.
बेंच ने कहा कि सिंगल जज के आदेश को पूरी तरह से पढऩे पर यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि आपराधिक जांच का निर्देश सीआरपीसी के सेक्शन 340 के तहत न्याय के प्रशासन पर असर डालने वाले किसी अपराध (जैसे सिर्फ कोर्ट के डॉक्यूमेंट्स में झूठी गवाही) के लिए पूरी तरह से पास नहीं किया गया था. बल्कि, कोर्ट ने फ्रॉड बैंकिंग ट्रांजैक्शन और शेल एंटिटीज (शेल कंपनियां) के जरिए एस्टेट के फंड को हड़पने की एक बड़ी साजि़श की जांच करने के लिए अपनी बड़ी अंदरूनी शक्तियों का इस्तेमाल किया. इसलिए, सीआरपीसी के सेक्शन 341 के तहत प्रक्रियात्मक रोक या अपील की पाबंदियां यहां लागू नहीं होतीं.
बेंच ने कहा कि अपील करने वाले के वकील ने जोर देकर कहा कि हाई कोर्ट के सिंगल जज और डिवीजन बेंच ने हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निर्देश जारी किए, इससे अपील पर बुरा असर पड़ता है.
बेंच ने कहा, हम सीनियर वकील की इस बात को भी मानने में असमर्थ हैं, इसके उलट, हम हाई कोर्ट की इस बात से सहमत हैं कि हाई कोर्ट और खासकर डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में कहा है कि सिर्फ जांच शुरू करने से अपील करने वाले को कोई असल या ठोस नुकसान नहीं होगा. सुप्रीम कोर्ट ने अपील करने वाले की इस दलील को गलत बताया कि इंडियन सक्सेशन एक्ट एक सेल्फ-कंटेन्ड कोड है जो आपराधिक जांच को रोकता है.
बेंच ने कहा कि अगर अपील करने वाले ट्रस्ट ने सच में फंड का इस्तेमाल अच्छे चैरिटेबल कामों के लिए किया है, तो उसके पास जांच एजेंसी के सामने अपने अकाउंट्स और रिकॉर्ड रखने का पूरा मौका होगा. उसने कहा, कानून की यह तय स्थिति है कि सच सामने लाने के लिए पुलिस की जांच, अपने आप में, किसी कॉर्पोरेट या ट्रस्ट एंटिटी की पर्सनल लिबर्टी का उल्लंघन नहीं करती है. हाई कोर्ट ने सिर्फ जांच इकाई को चालू किया है ताकि वसीयतनामा कोर्ट को साइफन (हेराफेरी या गबन) किए गए एसेट्स का पता लगाने में मदद मिल सके.
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि इंडियन सक्सेशन एक्ट एस्टेट्स के एडमिनिस्ट्रेशन को कंट्रोल करता है, लेकिन यह उन लोगों को ताकत नहीं देता जो आपराधिक विश्वासघात, फर्जीवाड़ा, या जागीर को बीच में साइफन (हेराफेरी) करने की साजिश करते हैं.
टेस्टेटर (वसीयतकर्ता) की मौत के बाद, दो विरोधी वसीयतें सामने आईं. पहली वसीयत, 22 नवंबर, 2010 की, शेरनाज फारूख लॉयर और उनकी गुजर चुकी मां, विली पिरोजशा अवासिया ने पेश की थी. इस वसीयत के तहत, प्रतिवादी ने जायदाद के एग्जीक्यूट्रिस और बेनिफिशियरी (लाभार्थी) होने का दावा किया था.
इसके उलट, 08 सितंबर, 2011 की दूसरी वसीयत मानेक दारा सुखदवाला ने पेश की थी. बाद की वसीयत में कथित तौर पर पूरी एस्टेट को चैरिटेबल मकसदों के लिए दे दिया गया और सुखदवाला को अकेला एग्जीक्यूटर बनाया गया. हाई कोर्ट ने जून 2021 में अंतरिम राहत दी, सुखदवाला पर रोक लगाई और उन्हें एस्टेट (जायदाद) की सभी चल और अचल संपत्तियों का खुलासा करने का निर्देश दिया.
इसके बाद जोनाथन सोलोमन को एस्टेट का एडमिनिस्ट्रेटर पेंडेंटे लाइट (मुकदमा लंबित रहने तक नियुक्त प्रशासक) नियुक्त किया गया. एक जांच में पता चला कि सुखदवाला ने एक बैंक अकाउंट खोला था और वसीयत करने वाले की मौत के तुरंत बाद इस अकाउंट से दो बड़ी रकम ट्रांसफर की गई थी. इनमें से एक ट्रांसफर 17,08,147 रुपये की एक बड़ी रकम थी, जो एक प्राइवेट कंपनी, मेसर्स अमोहा ट्रेडर्स प्राइवेट लिमिटेड को ट्रांसफर की गई थी.
बेंच ने नोट किया कि एडमिनिस्ट्रेटर ने ट्रस्ट के हितों की रक्षा के लिए ब्याज के साथ पैसे वापस करने के निर्देश मांगते हुए एक रिपोर्ट फाइल की थी. यह कहा गया कि एडमिनिस्ट्रेटर की जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए, यानी एग्जीक्यूटिव सुखदवाला और एक अन्य प्राइवेट व्यक्ति जिमी पांडे के बीच एक साजिश. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सुखदवाला, जिनसे वसीयत करने वाले के हितों की रक्षा की उम्मीद थी, ने दस्तावेजों में हेरफेर करने और रकम की हेराफेरी करने का काम किया.
बेंच ने कहा, एक और चौंकाने वाली बात यह भी सामने आई कि हालांकि यह दावा किया गया था कि ट्रस्ट असल में 1943 में बनाया गया एक पारसी परिवार का ट्रस्ट था, लेकिन सुखदवाला ने यह दिखाने की कोशिश की कि यह ट्रस्ट 1954 में एक व्यक्ति नवल टाटा ने बनाया था.
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