शाहपुर ग्राम पंचायत का मामला
डिंडोरी 7 जून (आरएनएस)। ग्रामीण विकास और रोजगार सृजन के लिए केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा पंचायतों को करोड़ों रुपये की राशि उपलब्ध कराई जाती है, ताकि गांवों में मूलभूत सुविधाओं का विस्तार हो सके और स्थानीय मजदूरों को रोजगार के अवसर मिलें। लेकिन डिंडोरी जिले की कुछ ग्राम पंचायतों में सरकारी योजनाओं की मंशा के विपरीत कार्य किए जाने के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। ताजा मामला जनपद पंचायत डिंडोरी अंतर्गत ग्राम पंचायत शाहपुर का है, जहां 15वें वित्त आयोग की राशि से कराए गए सीसी सड़क निर्माण कार्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
ग्रामीणों और स्थानीय सूत्रों के अनुसार ग्राम पंचायत शाहपुर में सरपंच मोहल्ले में सीसी सड़क निर्माण कार्य कराया गया है। आरोप है कि निर्माण कार्य में मजदूरों को रोजगार देने के बजाय मशीनों का उपयोग किया गया, जिससे स्थानीय श्रमिकों को काम से वंचित होना पड़ा। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विभिन्न योजनाएं संचालित कर रही है, लेकिन पंचायत स्तर पर जिम्मेदारों द्वारा मशीनों को प्राथमिकता देकर मजदूरों के हक और अधिकारों का हनन किया जा रहा है।
ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायतों में पदस्थ उपयंत्री अपने चहेते मशीन मालिकों को लाभ पहुंचाने में लगे हुए हैं। चाहे इसके लिए स्थानीय मजदूरों का रोजगार प्रभावित ही क्यों न हो। यही कारण है कि जिले के कई गांवों से आज भी लोग रोजगार की तलाश में अन्य जिलों और राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। यदि पंचायत स्तर पर निर्माण कार्यों में स्थानीय मजदूरों को प्राथमिकता दी जाए तो उन्हें गांव में ही रोजगार मिल सकता है, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत दिखाई दे रही है।
मामले में यह भी आरोप लगाया गया है कि सीसी सड़क निर्माण के दौरान गुणवत्ता संबंधी मानकों का पालन नहीं किया गया। ग्रामीणों के अनुसार निर्माण स्थल पर वाइब्रेटर मशीन तो लाई गई थी, लेकिन उसका उपयोग नहीं किया गया। निर्माण कार्यों में वाइब्रेटर का उपयोग कंक्रीट को मजबूती प्रदान करने और उसमें मौजूद खाली स्थानों को समाप्त करने के लिए किया जाता है। यदि इसका उपयोग नहीं किया गया है तो सड़क की गुणवत्ता और टिकाऊपन पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि पंचायत द्वारा निर्माण कार्य से संबंधित लागत और स्वीकृत राशि की जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई। जब पंचायत के सरपंच से सड़क निर्माण की लागत के संबंध में जानकारी मांगी गई तो उन्होंने स्पष्ट जानकारी देने से परहेज किया। इससे पारदर्शिता को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। पंचायत राज व्यवस्था में विकास कार्यों की जानकारी सार्वजनिक करना और सूचना पटल के माध्यम से आम लोगों को अवगत कराना आवश्यक माना जाता है, लेकिन यहां निर्माण स्थल पर सूचना पटल तक नहीं लगाया गया।
सूत्रों का कहना है कि ग्राम पंचायत शाहपुर में ऐसे कई कार्य लंबित पड़े हुए हैं जिनकी तत्काल आवश्यकता है। गांव के विभिन्न हिस्सों में मरम्मत और विकास कार्यों की जरूरत होने के बावजूद सरपंच मोहल्ले में सड़क निर्माण को प्राथमिकता दी गई। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या पंचायत निधि का उपयोग वास्तव में जनहित को ध्यान में रखकर किया गया या फिर व्यक्तिगत सुविधा को प्राथमिकता दी गई।
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि निर्माण कार्य में मशीनों का उपयोग किस आधार पर किया गया। पंचायत स्तर के निर्माण कार्यों में मशीनों के उपयोग को लेकर शासन के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं। ऐसे में यह जानना आवश्यक है कि क्या मशीनों से कार्य कराने के लिए विभागीय स्तर पर आवश्यक अनुमति ली गई थी या नहीं। यदि अनुमति नहीं ली गई तो यह नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में आ सकता है।
मामले को लेकर जब क्लस्टर उपयंत्री धर्मेंद्र यादव से संपर्क कर उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया तो उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। आरोप है कि कई बार कॉल किए जाने के बावजूद उन्होंने बात करना उचित नहीं समझा और फोन काट दिया। इससे ग्रामीणों में यह चर्चा है कि कहीं न कहीं निर्माण कार्य में अनियमितताओं को लेकर जवाबदेही से बचने का प्रयास किया जा रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि उपयंत्री के संरक्षण में ही मशीनों के माध्यम से कार्य कराया गया और मजदूरों को रोजगार से वंचित रखा गया।
ग्रामीणों का कहना है कि सरकार गांवों में रोजगार उपलब्ध कराने, पलायन रोकने और पारदर्शी विकास सुनिश्चित करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। इसके बावजूद यदि पंचायत स्तर पर नियमों की अनदेखी कर मशीनों से कार्य कराए जा रहे हैं और विकास कार्यों में पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है, तो यह शासन की मंशा के विपरीत माना जाएगा।
अब सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन और जनपद पंचायत के वरिष्ठ अधिकारी इस मामले की निष्पक्ष जांच कराएंगे? क्या निर्माण कार्य में मशीनों के उपयोग, गुणवत्ता मानकों और 15वें वित्त आयोग की राशि के उपयोग की जांच होगी? क्या मजदूरों के रोजगार अधिकारों के हनन के आरोपों की पड़ताल की जाएगी? इन सभी सवालों के जवाब आने वाले दिनों में प्रशासनिक कार्रवाई पर निर्भर करेंगे।
फिलहाल ग्राम पंचायत शाहपुर का यह मामला ग्रामीण विकास योजनाओं की पारदर्शिता, मजदूरों के अधिकारों और पंचायत स्तर पर जवाबदेही को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है। ग्रामीणों की निगाहें अब जिला प्रशासन और संबंधित अधिकारियों पर टिकी हैं कि वे इस पूरे प्रकरण में क्या कदम उठाते हैं और दोषियों पर क्या कार्रवाई होती है।
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