नई दिल्ली, 09 जून (आरएनएस)। वित्तीय दुनिया में एक नया बदलाव तेजी से आकार ले रहा है और क्रिप्टो इंडस्ट्री चुपचाप इसके मुख्य निर्माताओं में से एक बन गई है। कई वर्षों तक वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (VDA) को मुख्य रूप से खरीदने, रखने और ट्रेड करने वाली संपत्ति के रूप में देखा गया। लेकिन अब इससे कहीं बड़ा बदलाव सामने आ रहा है। उनकी मूल तकनीक—ब्लॉकचेन और स्टेबलकॉइन—अब ऐसे लेनदेन की नींव बन रही है जिन्हें कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि उसकी ओर से काम करने वाला सॉफ्टवेयर पूरा करता है। इन्हें स्वायत्त भुगतान (एजेंटिक पेमेंट्स) कहा जाता है। एआई एजेंट एक ऐसा प्रोग्राम होता है जिसे कोई लक्ष्य दिया जा सकता है, जैसे—”हर महीने मेरी निष्क्रिय बचत को बेहतर रिटर्न वाले विकल्प में लगाओ” या “शुक्रवार तक डिलीवरी देने वाले सबसे सस्ते सप्लायर से यह पार्ट खरीदो।” इसके बाद वह बिना किसी अतिरिक्त निर्देश के पूरा काम कर सकता है। काम पूरा करने के लिए एजेंट को भुगतान या ट्रेड भी करना पड़ता है। यहीं पर पारंपरिक भुगतान प्रणालियों की सीमाएं सामने आती हैं। बैंक कार्ड और कार्ड नेटवर्क इस तरह बनाए गए हैं कि कोई व्यक्ति एक बार चेकआउट पर अपनी जानकारी दर्ज करके भुगतान करे। इन्हें इस उद्देश्य से नहीं बनाया गया था कि कोई सॉफ्टवेयर दिन-रात, दुनिया के किसी भी हिस्से में, हर मिनट सैकड़ों छोटे-छोटे लेनदेन कर सके। क्रिप्टो रेल्स उनकी इस कमी को पूरा करती हैं। स्टेबलकॉइन एक डिजिटल टोकन होता है जिसकी कीमत डॉलर या रुपये जैसी पारंपरिक मुद्रा से जुड़ी रहती है, इसलिए इसकी कीमत बिटकॉइन की तरह तेजी से ऊपर-नीचे नहीं होती। चूंकि यह ब्लॉकचेन पर संचालित होता है, इसलिए इसे चौबीसों घंटे तुरंत भेजा जा सकता है, बेहद छोटी राशि में भी इस के साथ भुगतान किया जा सकता है, और खर्च से जुड़े नियम सीधे कोड में लिखे जा सकते हैं। किसी एआई एजेंट को एक डिजिटल वॉलेट दिया जा सकता है जिसमें स्पष्ट सीमाएं तय हों—इतनी राशि से अधिक खर्च नहीं करना है, केवल निर्धारित पक्षों के साथ ही लेनदेन करना है और केवल तय तारीख तक ही भुगतान करना है। इसके बाद एजेंट स्वतः काम कर सकता है, और हर लेनदेन ब्लॉकचेन के साझा रिकॉर्ड में दर्ज होता रहता है, जिसे बाद में कोई भी जांच सकता है। यदि इन सवालों के स्पष्ट उत्तर नहीं मिले तो भारतीय उपभोक्ता और कंपनियां विदेशों में विकसित एजेंट सिस्टम पर निर्भर हो जाएंगी, जहां लेनदेन विदेशी मुद्रा आधारित स्टेबलकॉइन में होंगे और उनका नियामकीय नियंत्रण भी भारत के बाहर होगा। इसलिए एक संतुलित नियामकीय ढांचे की आवश्यकता है, जिसमें RBI और FIU-IND की निगरानी में एजेंट-आधारित भुगतान और क्रिप्टो रेल्स पर ट्रेडिंग के परीक्षण के लिए एक सुपरवाइज्ड सैंडबॉक्स भी शामिल हो। इससे भारत इस बदलाव को केवल अपनाने वाला देश नहीं, बल्कि इसकी दिशा तय करने वालों में शामिल हो सकता है।
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