लखनऊ 10 जून (आरएनएस ),बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के वैज्ञानिकों ने क्षय रोग (टीबी) के उपचार और दवा विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। विश्वविद्यालय के शोधकर्ता डॉ. युसुफ अख्तर और शोधार्थी प्रज्ञा आनंद ने माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस के एटीपी सिंथेज़ का एक उन्नत आभासी मॉडल विकसित किया है, जो टीबी के निदान और नई प्रभावी दवाओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका जर्नल ऑफ सेल्युलर बायोकेमिस्ट्री में प्रकाशित हुआ है।बीबीएयू की शोध टीम ने राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन के अंतर्गत उपलब्ध अत्याधुनिक कंप्यूटिंग संसाधनों का उपयोग करते हुए यह उपलब्धि हासिल की है। शोधकर्ताओं ने परम स्मृति सुपरकंप्यूटर की सहायता से माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस के एटीपी सिंथेज़ का एक अत्यंत जटिल और यथार्थवादी मॉडल तैयार किया, जिसमें लगभग चार लाख परमाणुओं का समावेश किया गया। इस मॉडल में प्रोटीन संकुल, लिपिड द्विपरत झिल्ली, बेडाक्विलीन दवा तथा हजारों जल अणुओं को शामिल कर उनके बीच होने वाली सूक्ष्म परस्पर क्रियाओं का अध्ययन किया गया।विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने इस महत्वपूर्ण उपलब्धि पर डॉ. युसुफ अख्तर और प्रज्ञा आनंद को बधाई देते हुए कहा कि यह शोध विश्वविद्यालय के लिए गौरव का विषय है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित यह अध्ययन न केवल विश्वविद्यालय की शोध क्षमता को प्रदर्शित करता है, बल्कि देश की वैज्ञानिक प्रगति और राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग अवसंरचना में किए गए निवेश की सफलता का भी प्रमाण है।डॉ. युसुफ अख्तर ने बताया कि शोध के दौरान यह महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि टीबी की प्रमुख दवा बेडाक्विलीन अपने लक्ष्य स्थल पर केवल स्थिर नहीं रहती, बल्कि लगातार गतिशील अवस्था में रहते हुए एटीपी सिंथेज़ के साथ जटिल परस्पर क्रिया करती है। यह प्रक्रिया केवल प्रोटीन तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसके आसपास मौजूद झिल्ली लिपिड और जल अणु भी इसमें सक्रिय भूमिका निभाते हैं। यही गतिशील व्यवहार यह समझने में सहायता करता है कि दवा किस प्रकार जीवाणु की ऊर्जा उत्पादन प्रणाली को बाधित कर उसे कमजोर बनाती है।शोध में उन प्रोटॉन मार्गों का भी विस्तृत अध्ययन किया गया जो एटीपी सिंथेज़ की घूर्णन प्रक्रिया को संचालित करते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन मार्गों की संरचना और कार्यप्रणाली को समझकर भविष्य में ऐसी नई दवाएं विकसित की जा सकती हैं जो जीवाणुओं की ऊर्जा उत्पादन प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी ढंग से बाधित कर सकें तथा दवा प्रतिरोध की समस्या को कम कर सकें।अध्ययन की एक अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धि जीवाणु झिल्ली की सक्रिय भूमिका को उजागर करना है। सामान्यत: दवा अनुसंधान में झिल्ली को केवल एक निष्क्रिय पृष्ठभूमि माना जाता है, लेकिन इस शोध में यह स्पष्ट हुआ कि झिल्ली स्वयं दवा और लक्ष्य प्रोटीन के बीच होने वाली क्रियाओं को प्रभावित करती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस पहलू पर आगे और गहन अध्ययन से टीबी उपचार के लिए नई रणनीतियों का विकास संभव हो सकेगा।शोधकर्ताओं के अनुसार इस अध्ययन का महत्व केवल बेडाक्विलीन दवा तक सीमित नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन वर्तमान में दवा-प्रतिरोधी टीबी के उपचार के लिए बेडाक्विलीन सहित कई नई दवाओं वाले संयोजन उपचार की सिफारिश कर रहा है। ऐसे में भविष्य की दवाओं को प्रभावी, सुरक्षित और प्रतिरोधी जीवाणुओं के विरुद्ध अधिक सक्षम बनाना आवश्यक है। यह शोध ऐसी दवाओं के विकास के लिए वैज्ञानिकों को एक महत्वपूर्ण आणविक मार्गदर्शन प्रदान करता है।टीबी आज भी विश्व की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों में से एक बनी हुई है। वर्ष 2024 में दुनिया भर में लगभग 1.07 करोड़ लोग टीबी से प्रभावित हुए, जबकि करीब 12.3 लाख लोगों की मृत्यु इस बीमारी के कारण हुई। इनमें बड़ी संख्या भारत से संबंधित थी। गरीबी, कुपोषण, भीड़भाड़, देर से निदान और अधूरा उपचार आज भी टीबी के प्रसार के प्रमुख कारण बने हुए हैं। इसके साथ ही दवा-प्रतिरोधी टीबी के बढ़ते मामले स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए नई चुनौती बन रहे हैं।वैज्ञानिकों का कहना है कि माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस जीवाणु की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अपनी चयापचय क्रिया को अत्यंत धीमा कर लगभग निष्क्रिय अवस्था में पहुंच सकता है, जिससे कई पारंपरिक दवाएं उस पर प्रभावी नहीं रह जातीं। यही कारण है कि नई और अधिक प्रभावी दवाओं की खोज आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है।वर्ष 2012 में टीबी उपचार के लिए स्वीकृत बेडाक्विलीन लगभग पांच दशकों बाद विकसित हुई पहली नई टीबी दवा थी। यह जीवाणु की ऊर्जा उत्पादन मशीनरी एटीपी सिंथेज़ को निशाना बनाकर कार्य करती है। बीबीएयू की शोध टीम द्वारा किया गया यह अध्ययन इस दवा और जीवाणु की ऊर्जा उत्पादन प्रणाली के बीच होने वाली जटिल आणविक क्रियाओं को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।विश्वविद्यालय के शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भी इस उपलब्धि पर शोध दल को बधाई देते हुए इसे विश्वविद्यालय तथा देश के वैज्ञानिक समुदाय के लिए गर्व का विषय बताया है। यह सफलता न केवल बीबीएयू की शोध क्षमता को नई पहचान देती है, बल्कि टीबी जैसी गंभीर बीमारी के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में भारतीय वैज्ञानिकों के बढ़ते योगदान को भी रेखांकित करती है।
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