रायपुर, 29 जून (आरएनएस)। छत्तीसगढ़ में मानसून की सुस्त रफ्तार ने खरीफ सीजन की शुरुआत को करीब एक सप्ताह पीछे धकेल दिया है। जून के आखिरी सप्ताह तक प्रदेश के अधिकांश जिलों में धान की बुआई शुरू हो जाती है, लेकिन इस बार किसान अब भी अच्छी बारिश का इंतजार कर रहे हैं।
मानसून आने के बावजूद ज्यादातर जिलों में सामान्य से 45 से 80 फीसदी तक कम बारिश हुई है। खेतों में इतनी नमी भी नहीं आ पाई कि जुताई और बुआई शुरू हो सके। जहां हल्की बारिश हुई है, वहां किसानों ने पहली जुताई कर खेत छोड़ दिए हैं। अब एक-दो अच्छी बारिश के बाद दोबारा जुताई कर बुआई की जाएगी। धान की रोपा और बोता दोनों पद्धतियों के लिए शुरुआती दौर में खेतों में पर्याप्त नमी और पानी का ठहराव जरूरी होता है, जो फिलहाल अधिकांश क्षेत्रों में नहीं बन पाया है। 25 जून को ज्येष्ठ माह की एकादशी के साथ प्रदेश में परंपरागत रूप से खरीफ बुआई का शुभारंभ माना जाता है, लेकिन इस बार अधिकांश किसानों ने केवल तैयारी की है।
जल्दबाजी में न करें बुआई
इस साल मानसून की शुरुआत अपेक्षा से धीमी रही है, इसलिए पिछले वर्ष की तुलना में खरीफ की बुआई कुछ पीछे है। हालांकि किसानों को इसे लेकर घबराने की जरूरत नहीं है। खेती में जल्दबाजी नुकसानदायक हो सकती है। खेत में केवल ऊपरी सतह पर नमी देखकर बुआई न करें। जब तक मिट्टी करीब 88 से 10-10 इंच की गहराई तक अच्छी तरह नहीं भीग जाए, तब तक बुआई टालना ही बेहतर है।
अर्ली किस्म की धान लगाएं
इस वर्ष मौसम वैज्ञानिकों ने मानसून अपेक्षाकृत कमजोर रहने की आशंका जताई है। ऐसी स्थिति में किसानों को कम अवधि (अर्ली मैच्योरिंग) वाली धान की किस्मों को प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि बारिश कम होने पर भी फसल का जोखिम घट सके। जिन क्षेत्रों में परिस्थितियां अनुकूल हों, वहां किसान फसल विविधीकरण अपनाकर बेहतर आय प्राप्त कर सकते हैं। सरकार धान के स्थान पर अन्य फसलें लेने वाले किसानों को प्रति एकड़ 15 हजार रुपए तक का प्रोत्साहन भी दे रही है।
छत्तीसगढ़ में बुआई की पद्धतियां
थरहा (नर्सरी) सबसे अधिक प्रचलित। इसके लिए अच्छी वर्षा और पर्याप्त पानी की आवश्यकता होती है। पहले खेत में सीधे बीज बो दिए जाते हैं। यह खरपतवार नियंत्रण में मदद करती है। यह एक पारंपरिक छत्तीसगढ़ी पद्धति है। सीधी बुआई, बीज सीधे खेत में डाले जाते हैं। इसमें रोपाई की जरूरत नहीं पड़ती। जहां सिंचाई सीमित हो, वहां यह पद्धति तेजी से बढ़ रही है। छींटा या प्रसारण विधि बीज हाथ से पूरे खेत में बिखेर दिए जाते हैं। यह सबसे सरल और कम लागत वाली पद्धति है।
एसएस
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