सिरसा।(सतीश बांसल) 1 जुलाई का दिन महान डा. वी. सी. रॉय की याद को समर्पित है। आधुनिकता के साथ-साथ हर क्षेत्र में परिवर्तन आया, लेकिन डॉक्टर वर्ग आज भी उपेक्षा का शिकार है। डा. रॉय सफल डॉक्टर के साथ-साथ सफल राजनीतिज्ञ भी थे, जो कि बंगाल के मुख्यमंत्री भी रहे। हालांकि भारतीय होने के कारण पहले उन्हें लंदन के अस्पताल में दाखिला नहीं दिया गया था, पर डॉक्टर बिधान हिम्मत हारने वालों में से नहीं थे और लगातार आवेदन करते रहे। आखिरकार 30वीं बार में उनका आवेदन पत्र स्वीकार कर लिया गया। डॉक्टर रॉय इतने मेधावी थे कि दो साल में ही उन्होंने एक साथ फिजिशियन और सर्जन की डिग्री हासिल कर ली। 1911 में बिधान चंद्र रॉय भारत वापस आ गए और सियालदाह में सरकारी डॉक्टर के रूप में अपने करियर की शुरूआत की। डा. गोयल ने कहा कि दुनिया के किसी भी राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान डॉक्टर, इंजीनियर व वैज्ञानिकों का होता है। इस बात को पश्चिमी जगत भली भांति समझता है, इसलिये वे आगे हैं। इस विषय की गंभीरता की जानकारी देश के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू व भाजपा के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भली भांति पता थी। इस लिये अटल बिहारी वाजपेयी का नारा था, जय जवान-जय किसान व जय विज्ञान। डा. वीपी गोयल ने वर्तमान परिदृश्य पर चोट करते हुए कहा कि आज की परिस्थितियां बिल्कुल विपरीत हैं। जहां राजनैतिक सोच जनता से वोट बटोरने के नाम पर लोकलुभावनी बड़ी-बड़ी घोषणाएं करती है और उसके नाम पर सरकारी व प्राइवेट डॉक्टर का दोहन भी करती है, लेकिन विशेष रूप से प्राइवेट डॉक्टर, मेडिकल की समस्याओं के प्रति राजनैतिक व सरकारी अमला उदासीन ही नहीं, बल्कि द्वेषपूर्ण रवैया भी रखते हैं। जिसके फलस्वरूप अपनी जीवन की बाजी लगाकर मेडिकल हितों की रक्षा करने वाला डॉक्टर वर्ग अपने आप को उपेक्षित व ठगा सा महसूस करता है। डा. गोयल ने कहा कि इसलिये जरुरत है कि सरकारी तंत्र व राजनैतिक नेता व मंत्री, डॉक्टरों के बीच बैठें और समाज व राज्य के हित के लिये मिलकर काम करें।
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