0 कोड़ेकुर्से में प्रवेश पर लगाया गया प्रतिबंध
0 बस्तर में कन्वर्जन के खिलाफ मुहिम हुई तेज =
= अर्जुन झा =
जगदलपुर, 13 नवंबर (आरएनएस)। बस्तर संभाग का आदिवासी समुदाय अब जाग उठा है। नक्सलियों की थोथी और विकास विरोधी विचारधारा तथा छल प्रपंच, प्रलोभन के दम पर मतांतरण कराने वालों के खिलाफ आदिवासी एवं दूसरे समुदायों के लोग मुखर हो उठे हैं। गांव गांव में मतांतरण कराने वालों का प्रवेश निषेध किया जा रहा है। दर्जनों गांवों में ?सी पहल की जा चुकी है। अब संभाग के कांकेर जिले की दुर्गूकोंदल के ग्राम कोड़ेकुर्से में भी पास्टर पदरियों की एंट्री बैन कर दी गई है। गांव के प्रवेश द्वार पर इस आशय का बोर्ड लगा दिया गया।
ग्राम कोड़ेकुर्से में 12 नवंबर को सुबह लगभग 8 बजे ग्रामीणों बड़ी बैठक कर निर्णय लिया कि धर्म परिवर्तन मूल धर्म, संस्कृति और परंपराओं पर बड़ा खतरा बन गया है। बाहरी लोग गांव में आकर और भोले भाले ग्रामीणों को बहला फुसला कर, प्रलोभन देकर उनका धर्म परिवर्तन करा लेते हैं। इसस जातीय मतभेद के हालात बन जाते हैं। इसलिए पादरी पास्टर के गांव में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया जाएगा। इस संबंध में गांव के प्रवेश द्वार पर बोर्ड भी लगा दिया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव में धर्म परिवर्तन की गतिविधियों को रोकने के उद्देश्य से यह निर्णय लिया गया है। इस दौरान ग्राम के गायता संपत हिड़को, अजित हिड़को, जवाहर ठाकुर, पुनऊराम तारम, ओम मरकाम, सहदेव बघेल, रघुनंदन गोस्वामी, अमरचंद जैन सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे। ग्रामीणों के इस कदम से क्षेत्र में चर्चा का माहौल बन गया है। बताया जा रहा है कि यह निर्णय सामूहिक बैठक में लिया गया ताकि गांव में सामाजिक सौहार्द और परंपरागत आस्था बनी रहे। बता दें कि यह अभियान बस्तर संभाग के गांव गांव में चल रहा है। अब तक दर्जनों गांवों में ऐसा कदम उठाया जा चुका है। ज्ञात हो कि इसी तहसील के एक गांव में निषाद केंवट समाज के एक कन्वर्टेड युवक के अंतिम संस्कार को लेकर बड़ा हंगामा मचा था। गांव में 3-4 दिनों तक तनावपूर्ण हालात बने रहे। पुलिस और प्रशासन को भी हस्तक्षेप करना पड़ा, तब कहीं जाकर युवक का अंतिम संस्कार कहीं और हो पाया।
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अब पछताए होत क्या
अब पछताए होत क्या जब चिडिय़ा चुग गई खेत संत कबीर का यह दोहा आज बस्तर संभाग के आदिवासी और दीगर समुदायों पर बिल्कुल फिट बैठ रही है। पानी सिर से काफी ऊपर बह रहा है। सभी जाति समुदायों की लगभग 20 फीसदी आबादी मतांतरित हो चुकी है। आर्थिक तंगी, बीमारी आदि से राहत पहुंचाने के नाम पर मतांतरण का खेल यहां जमकर चल रहा है। अब जाकर लोग सच्चाई और अपने मूल धर्म, रीति रिवाजों, परंपराओं तथा पूजा पद्धति का महत्व समझने लगे हैं। लोग अपने मूल धर्म में वापस आने लगे हैं। जब जगे तभी सबेरा की कहावत अब जाकर बस्तर में चरितार्थ होने लगी है।
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