नई दिल्ली , 26 मार्च (आरएनएस)। भारत में वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (वीडीएज़) को लेकर आज एक स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है। एक तरफ देश क्रिप्टो अपनाने के मामले में लगातार दुनिया में अग्रणी बना हुआ है, वहीं दूसरी तरफ इस क्षेत्र को लेकर नीतिगत स्पष्टता का अभाव भी साफ नजर आता है। यह अंतर केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि नीति और व्यवहार के बीच बढ़ती दूरी को भी दिखाता है। चेनालिसिस की रैंकिंग में लगातार तीसरे वर्ष शीर्ष स्थान हासिल करना और वेब थ्री तथा पब्लिक ब्लॉकचेन से जुड़े विभिन्न अध्ययनों में भारत का प्रमुख डिजिटल एसेट बाजार के रूप में उभरना इस बात का संकेत है कि देश में इस तकनीक को व्यापक स्तर पर अपनाया जा चुका है। वीज़ा इंक की एक हालिया स्टडी भी भारत को तुर्की और ब्राज़ील जैसे उभरते बाजारों के साथ क्रिप्टो अपनाने के प्रमुख केंद्रों में रखती है। इसके साथ ही, भारत का बढ़ता डेवलपर बेस—जहां इंजीनियर और संस्थापक वैश्विक ब्लॉकचेन प्रोटोकॉल्स और स्टार्टअप्स में योगदान दे रहे हैं—इस प्रवृत्ति को और मजबूत करता है। इसके बावजूद, सरकार का दृष्टिकोण अब तक सतर्क और सीमित रहा है। पूंजी नियंत्रण, वित्तीय स्थिरता और भुगतान प्रणाली की सुरक्षा जैसी चिंताएं अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि वर्चुअल डिजिटल एसेट्स की प्रकृति पारंपरिक वित्तीय ढांचे से अलग है। यह एक सीमाहीन और इंटरनेट आधारित प्रणाली है, जिसे पुराने नियमों के जरिए पूरी तरह नियंत्रित करना आसान नहीं है। आज भारत के सामने चुनौती यह नहीं है कि वीडीएज़ को स्वीकार किया जाए या नहीं—यह चरण अब पार हो चुका है। असली सवाल यह है कि क्या देश इस तेजी से बढ़ते क्षेत्र के लिए एक संतुलित, स्पष्ट और व्यावहारिक नीति ढांचा तैयार कर पाएगा। भारत का वीडीए इकोसिस्टम एक ऐसे अधूरे संतुलन को दर्शाता है, जहां पूर्ण विकसित नियामकीय ढांचे के बिना टैक्स लागू है। यदि यह अंतर जारी रहता है, तो न केवल नियामकीय नियंत्रण कमजोर होगा, बल्कि संभावित आर्थिक अवसर भी सीमित हो सकते हैं। ऐसे में जरूरत है कि अस्थायी उपायों से आगे बढ़कर एक सुसंगत और व्यापक विधायी ढांचा तैयार किया जाए, जो स्थिरता, नवाचार और पारदर्शिता—तीनों को साथ लेकर चले, और तेजी से विकसित हो रहे इस बाजार में नियामकीय नियंत्रण को भी मजबूत करे।
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